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अटल बिहारी वाजपेयी की 5 कविताएं

Atal Bihari Vajpayee Poetry : अटल बिहारी बाजपेयी एक नेता के साथ ही एक कवि भी रहे, जिनकी कविताएं आज भी लोगों के लिए प्रेरणा हैं।
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नोएडा

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Ashutosh Pathak

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Updated: 16 Aug 2018, 1:25 PM IST

atal bihari

अटल बिहारी वाजपेयी की 5 कविताएं

नोएडा। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को ऐसे नेता के रुप में जाना जाता है जिसने भारतीय रजनीति को एक नया आकार दिया। अटल बिहारी वाजपेयी की जन्मभूमी तो मध्यप्रदेश में रही लेकिन उनकी कर्म भूमी उत्तर प्रदेश रही है। एक कुशल नेता के साथ ही अटल बिहारी एक प्रखर वक्ता और दूरदर्शी के साथ ही अपनी बातों और भावनाओं को शब्दों में पिरोने वाले एक बेहतरीन कवि भी रहे हैं। चाहे देश के किसानों की स्थिती पर हो या सरहद पर सुरक्षा में खड़े जवानों के हौसले की बात हो या फिर संसद के भीतर विपक्ष के तिखें सवालों से घिरे हों, अटल बिहारी अपनी कविताओं के जरिए सबको सटीक जवाब देते।

राजनीति के अजातशत्रु के नाम से विख्यात अटल जी ने कई ऐसी कविताएं भी लिखीं जिसनें देश के युवाओं को भी अपनी होर खिंचा। देश के कई युवा आज भी अटल बिहारी की कविताओं को पढ़ कर प्रेरणी लेते हैं। आज अटल बिहारी बाजपेयी के कुछ लिखी कविताएं पर नजर डालते हैं-

बाधाएँ आती हैं आएँ
घिरें प्रलय की घोर घटाएँ,
पावों के नीचे अंगारे,
सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ,
निज हाथों में हँसते-हँसते,
आग लगाकर जलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

.........................................

हरी हरी दूब पर
ओस की बूंदे
अभी थी,
अभी नहीं हैं|
ऐसी खुशियाँ
जो हमेशा हमारा साथ दें
कभी नहीं थी,
कहीं नहीं हैं|

............................................

ख़ून क्यों सफ़ेद हो गया?
भेद में अभेद खो गया।
बँट गये शहीद, गीत कट गए,
कलेजे में कटार दड़ गई।
दूध में दरार पड़ गई।

..........................................

ठन गई!
मौत से ठन गई!
जूझने का मेरा इरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,
रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,
यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई।
मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,
ज़िन्दगी सिलसिल, आज कल की नहीं।
मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ,
लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ?
तू दबे पाँव, चोरी-छिपे से न आ,
सामने वार कर फिर मुझे आज़मा।
मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र,
शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर।
बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,
दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं।
प्यार इतना परायों से मुझको मिला,
न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला।
हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये,
आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए।
आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,
नाव भँवरों की बाँहों में मेहमान है।
पार पाने का क़ायम मगर हौसला,
देख तेवर तूफ़ाँ का, तेवरी तन गई।

...................…

ये भी देखें :
https://www.youtube.com/watch?v=4v5NUGUlhP8

IMAGE CREDIT: a

टूटे हुए तारों से फूटे बासंती स्वर
पत्थर की छाती में उग आया नव अंकुर

झरे सब पीले पात
कोयल की कूक रात
प्राची में अरुणिमा की रेख देख पाता हूं
गीत नया गाता हूँ।

टूटे हुए सपनों की सुने कौन सिसकी?
अंतर को चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी।

हार नहीं मानूँगा
रार नहीं ठानूँगा
काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूँ।
गीत नया गाता हूँ।

ये भी देखें : Geet naya gata hu ,full poem - atal bihari vajpayee