
छत्तीसगढ़ का "पोला पर्व", बच्चों से लेकर किसानों तक का प्रिय त्योहार... जानें इसकी परंपरा और मान्यताएँ(Photo-patrika-)
Pola Festival 2025: छत्तीसगढ़ का पोला पर्व प्रदेश की परंपरा, संस्कृति और कृषि से जुड़ा हुआ एक महत्वपूर्ण त्योहार है। यह पर्व मुख्य रूप से किसानों और पशुपालकों का पर्व माना जाता है, जिसे भाद्रपद मास (अगस्त–सितंबर) में अमावस्या के दिन मनाया जाता है। पोला पर्व का विशेष महत्व इसलिए है क्योंकि यह बैल और कृषि कार्य में सहायक पशुओं को समर्पित है। किसान इस दिन बैल की पूजा करते हैं और उन्हें आराम, साज-सज्जा और विशेष भोजन प्रदान करते हैं।
पोला पर्व का नाम बैलों के गले में डाले जाने वाले लकड़ी के औजार ‘पोला’ से पड़ा है। परंपरा है कि इस दिन बैलों को स्नान कराकर, उनके शरीर पर हल्दी, तेल और गोबर लगाया जाता है। उनकी सींगों को रंग-बिरंगे रंगों से सजाया जाता है और गले में घंटियाँ, पायल व झुनझुने बाँधे जाते हैं। इसके बाद विधि-विधान से उनकी पूजा की जाती है। पूजा के उपरांत बैलों को खेत की मेड़ पर दौड़ाया जाता है जिसे पोला दौड़ कहा जाता है। बैलों को गुड़, चना और पकवान खिलाए जाते हैं। इस अवसर पर पूरे गांव में उत्सव जैसा माहौल होता है।
पोला पर्व से एक दिन पहले से ही तैयारियाँ शुरू हो जाती हैं। घरों की सफाई होती है, महिलाएँ विभिन्न प्रकार के व्यंजन और पकवान बनाती हैं। इस दौरान बच्चों के लिए भी यह पर्व विशेष महत्व रखता है। वे मिट्टी, लकड़ी या आटे से बने छोटे-छोटे बैल, जिन्हें ‘नंदिया बैल’ कहा जाता है, तैयार करते हैं।
इन नंदिया बैलों को रंग-बिरंगे कपड़े और झंडियों से सजाया जाता है। अगले दिन बच्चे इन्हें लेकर मोहल्ले और गांव में घूमते हैं और “पोला-पोला” कहते हुए मिठाई और उपहार प्राप्त करते हैं। यह परंपरा नई पीढ़ी को कृषि और बैलों के महत्व से जोड़ने का एक अनोखा तरीका है।
गांवों में पोला के अवसर पर मेलों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन किया जाता है। लोकगीत और नृत्य की धुन पर पूरा गांव उत्साह से झूम उठता है। महिलाएँ पारंपरिक सुआ गीत गाती हैं और पुरुष करमा या डंडा नृत्य करते हैं। बच्चे और युवा झूले का आनंद लेते हैं।
इस पर्व की खासियत यह है कि यह न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि सामाजिक एकता और सामूहिकता का भी प्रतीक है। गांव के सभी लोग मिलकर इस पर्व को मनाते हैं जिससे आपसी भाईचारा और सहयोग की भावना और मजबूत होती है।
अमावस्या की सुबह बैलों को नदी, तालाब या कुएं के पास ले जाकर नहलाया जाता है।
उन्हें हल्दी, तेल, सिंदूर, गोबर और फूलों से सजाया जाता है।
बैलों की सींगों को रंग-बिरंगे रंगों से रंगा जाता है और उनके गले में घंटियाँ, पायल और झुनझुने बाँधे जाते हैं।
पूजा के बाद बैलों को खेत की मेड़ों पर दौड़ाया जाता है, जिसे "पोला दौड़" कहा जाता है।
पूजा के समय बैलों को गुड़, चना, धान और विशेष पकवान खिलाए जाते हैं।
पोला पर्व का महत्व केवल बैलों की पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रकृति और कृषि संस्कृति के प्रति आभार व्यक्त करने का अवसर भी है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि मनुष्य का जीवन पूरी तरह से पशुधन और प्रकृति पर निर्भर है। खेती से जुड़ी यह परंपरा ग्रामीण जीवन में श्रम, सहयोग और सामूहिकता का संदेश देती है।
संक्षेप में कहा जाए तो छत्तीसगढ़ का पोला पर्व किसानों की आस्था, परंपरा और ग्रामीण संस्कृति का जीवंत प्रतीक है। यह पर्व बैलों के सम्मान, कृषि कार्य की महत्ता, सामाजिक एकता और नई पीढ़ी को परंपरा से जोड़ने की एक अद्भुत कड़ी है। यही कारण है कि पोला केवल एक धार्मिक अनुष्ठान न होकर ग्रामीण जीवन का उत्सव और लोक संस्कृति की धड़कन बन चुका है।
Published on:
23 Aug 2025 01:18 pm
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