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गुजरात चुनाव: सौराष्ट्र के खेतों में इस बार कौन काटेगा वोटों की फसल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सौराष्ट्र में रैली कर किसानों की समस्याओं के लिए कांग्रेस को दोषी ठहराया था।
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नई दिल्ली

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ashutosh tiwari

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Updated: 8 Dec 2017, 10:04 AM IST

BJP,Congress,election,Saurashtra,gujrat election

सफेद पगड़ी, सफेद घनी मूंछ व मोतियाबिंद से सफेद हो गई आंखों वाले 95 साल के भवान हीराभाई अपने खेतों के बीच बैठे हैं। हमारे आने का आभास होते ही पूछते हैं- 'कौन-सी पार्टी?' फिर कहते हैं कि इस बार तो चुनाव में भी कोई उनके पास नहीं आया। किसानों का हाल पूछने पर दार्शनिक अंदाज में आकाश की ओर देखते हुए स्थानीय कहावत कहते हैं- 'खेडुत देवुं जन्मे छे। देवुं माम मृत्यु पामे छे। बिंदु ए के केवी रीते जीवनमां देवुं व्यवस्था करे छे।' पास खड़े उनके पोते प्रदीप मतलब बताते हैं- 'किसान कर्ज में पैदा होता है और कर्ज में ही मरता है। बात बस इतनी है कि वह जीते जी कर्ज का प्रबंधन कैसे करता है।'

गुजरात के किसान कई दूसरे राज्यों के किसानों से बेहतर स्थिति में हैं। पिछले कुछ वर्षों में समृद्धि भी आई है। अब इनके अच्छे पक्के घर व मोटरसाइकिलें पर्याप्त संख्या में दिखती हैं। सौराष्ट्र के अद्र्धशुष्क इलाके में भी कृषि उत्पादन तेजी से बढ़ा है। जिला मुख्यालय से करीब 15 किमी दूर वडाल गांव के किसान दिनेश भाई खारशी भी इस बदलाव को स्वीकार करते हैं।

पर कहते हैं, 'उपज बढऩे से क्या फायदा अगर उसकी कीमत ही न मिले?' किसानों के बीच काम करने वाले राज्य के बड़े एनजीओ 'खेडुत समाज गुजरात' के जयेश भाई पटेल इसे यूं समझाते हैं, 'खेती की लागत बढ़ गई, जीवनयापन महंगा हो गया। पर फसलों की कीमत नहीं बढ़ रही। अक्सर मौसम की मार पड़ जाती है। सरकारी योजनाएं जमीन पर नहीं उतरतीं।'

2 दिन पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सौराष्ट्र में रैली कर किसानों की समस्याओं के लिए कांग्रेस को दोषी ठहराया था। यहां अब तक नर्मदा का पानी नहीं पहुंच पाने के लिए भी केंद्र की पिछली सरकारों को जिम्मेदार बताया था। अब यहां चुनाव प्रचार के आखिरी दिन घूम रहे कांग्रेस उम्मीदवार हर्षद भाई इसे बहानेबाजी बता रहे हैं और 22 साल का हिसाब मांग रहे हैं।

नाराज किसानों की खामोशी तय करेगी बहुत कुछ
तीन दशक से भाजपा के समर्थक दिनेश भाई कहते हैं कि इस बार वे वोट के बारे में नए सिरे से सोच रहे हैं। वह कहते हैं कि खेतों में बिजली समय से नहीं आती। फसल बीमा योजना का लाभ नहीं मिलता। वजू भाई बताते हैं कि 1 एकड़ में लगाई मूंगफली की कीमत 15,600 रु. मिली। 4 महीने का समय व 7,900 रु. की लागत के बाद क्या साढ़े सात हजार रु. में परिवार चल सकता है? खरीद की रसीद दिखाकर कहते हैं कि किसानों को सरकारी समर्थन मूल्य से बहुत कम में उपज बेचनी पड़ती है। नारद भाई बताते हैं कि सरकारी यार्ड में बिक्री के दौरान हर किलो 3 रु. कमीशन एडवांस में देना पड़ता है, जबकि भुगतान महीनों बाद मिलता है। सरकार ने किसानों को सिर्फ 1% ब्याज पर कर्ज देने की घोषणा की है, पर दिनेश भाई कागज दिखाते हैं कि उन्हें वडाल जूथ सेवा सहकारी मंडली ने 4% ब्याज पर कृषि कर्ज दिया है।

किसान क्यों परेशान
-खेती की लागत बढऩा
-जीवनयापन का महंगा होना
-फसलों की कीमत ज्यादा नहीं बढ़ी
-सरकारी खरीद व्यवस्था ठीक नहीं
-फसल बीमा का लाभ नहीं मिल रहा
-बिजली व सिंचाई की व्यवस्था कमजोर