
कचरा नहीं उठा तो बीमारी उठेंगी (फोटो सोर्स - पत्रिका)
रायपुर @अजय रघुवंशी। Chhattisgarh News: नगरीय निकायों के कलेक्शन सेंटर और डपिंग यार्ड में कई दिनों तक पड़ा रहने वाला कचरा हमारा ऑक्सीजन निगल रहा है। स्मार्ट सिटी से लेकर प्रदेश के अन्य जिलों में बारिश के दिनों में यह स्थिति खतरनाक हो रही है। राजधानी सहित दुर्ग-भिलाई, राजनांदगांव, धमतरी, कांकेर, बालोद, रायगढ़, कोरबा, अंबिकापुर, जगदलपुर ऐसे कई शहर जहां खुले में पड़ा कचरा हर दिन शहर की हवा, हेल्थ और इनवायरमेंट पर भारी पड़ रहा है। यह कचरा अब सिर्फ बीमारी और बदबू नहीं फैला रहा, बल्कि जहरीली गैसों का सोर्स बन चुका है।
राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी) रायपुर के विशेषज्ञों के अनुसार, कई दिनों तक कचरे के पड़े रहने से एक टन जैविक कचरे से लगभग 120 किलोग्राम तक मीथेन गैस उत्पन्न होती है, जो कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में कई गुना अधिक खतरनाक गैस मानी जाती है। यह हमारा ऑक्सीजन भी कम कर रहा है। पत्रिका ने इस गंभीर मुद्दे पर एक्सपर्ट के माध्यम से जो टेक्निकल एनालिसिस किया,वह चौकाने वाला है।
एक्सपर्ट के मुताबिक बारिश के दिनों में गीला कचरा तेजी से सड़ता है और मीथेन, अमोनिया तथा अन्य हानिकारक गैसों का उत्सर्जन बढ़ जाता है, जिससे आंखों में जलन, सांस लेने में परेशानी, त्वचा संबंधी संक्रमण और मच्छरों के पनपने जैसी समस्याएं बढ़ जाती हैं। इधर नगरीय प्रशासन विभाग का दावा है कि कचरे की प्रोसेसिंग कर खाद बनाई जाती है और कुछ हिस्सा सीमेंट प्लांटों में उपयोग होता है, वही छत्तीसगढ़ में रोजाना निकलने वाला कचरा लगभग 3000 टन से अधिक है।
नगरीय निकाय के अधिकारियों का कहना है कि गली-मोहल्लों से छोटी गाडिय़ों में कचरा कलेक्शन होता है। इसलिए कलेक्शन सेंटरों पर इसे डंप करना पड़ता है, ताकि बड़ी गाडिय़ों के आने पर इसे प्रोसेसिंग प्लांट सकरी भेजा जा सके। पत्रिका ने अपनी पड़ताल में पाया कि निगम की बड़ी गाडिय़ां कई दिनों के बाद इन स्थानों पर आती है।
सड़े हुए कचरे से निकलने वाली गैस न सिर्फ ऑक्सीजन कम करती है, बल्कि वायु गुणवत्ता भी खराब कर रही है।
बारिश के दिनों में कचरे से निकलने वाला रिसाव मिट्टी एवं भूजल को भी प्रदूषित करता है। यदि कचरे का 24-48 घंटे के भीतर वैज्ञानिक तरीके से संग्रहण एवं प्रसंस्करण किया जाए, तो ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन, मिट्टी एवं भूजल प्रदूषण तथा स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।
तकनीकी अध्ययनों के अनुसार, 1 टन मिश्रित नगरपालिका ठोस कचरे के जैविक अपघटन से उसकी संरचना एवं नमी के आधार पर लगभग 60-120 किलोग्राम मीथेन तथा 150-300 किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित हो सकती है। मीथेन एक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है, जिसका 100 वर्षों के समयमान पर तापवर्धक प्रभाव कार्बनडाईऑक्साइड की तुलना में लगभग 28 गुना अधिक माना जाता है। कचरे के अपघटन में सूक्ष्मजीव ऑक्सीजन का उपयोग करते हैं, जिससे आसपास के सूक्ष्म वातावरण में ऑक्सीजन की उपलब्धता घट सकती है।
दुर्गंधयुक्त गैसों एवं वायु प्रदूषण के कारण लोगों को घुटन, आंखों में जलन, सांस लेने में कठिनाई, एलर्जी तथा अस्थमा जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। - प्रो. सूरज कुमार मुक्ति, प्रोफेसर, मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग, एनआईटी रायपुर, लेप्टोस्पायरोसिस जैसी खतरनाक बीमारियां : डॉ. योगेंद्र मल्होत्रा
गंदे पानी या कचरे के सीधे संपर्क में आने से त्वचा पर रैशेज, खुजली व फंगल इन्फेक्शन हो जाते हैं। कचरे की वजह से चूहे व मवेशी आते हैं, जो लेप्टोस्पायरोसिस जैसी खतरनाक बीमारियां फैलाते हैं। इसलिए बेहतर है कि रात में मच्छरदानी लगाकर सोएं। यही नहीं कचरे के सडऩे से निकलने वाली बदबू व जहरीली गैसों से सांस लेने में परेशानी और दमा (अस्थमा) के मरीजों की हालत बिगड़ सकती है। कचरे से मक्खियां व कीड़े खाने-पीने की चीजों पर बैठते हैं, जिससे हैजा, डायरिया, टाइफाइड व पीलिया का खतरा बढ़ता है। बारिश के सीजन में नुक्कड़ों में कई दिनों तक कचरा नहीं उठने से मलेरिया व डेंगू का खतरा बढ़ जाता है। - डॉ. योगेंद्र मल्होत्रा, सीनियर प्रोफेसर मेडिसन विभाग, आंबेडकर अस्पताल
कलेक्शन सेंटर या डंपिंग यार्ड से डंप कचरे को उसी दिन उठाया जाना है। नगरीय प्रशासन विभाग ने इस संबंध में नगरीय निकायों को स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। खुले में कचरा फेंकने पर कार्यवाही की जानी है। - राजेश शर्मा, चीफ इंजीनियर, नगरीय प्रशासन एवं विकास
अधिकारियों को दिशा-निर्देश देता हूं कि ऐसे स्थान कि तत्काल जांच कर कचरे का तत्काल निष्पादन कराएं। साथ ही कलेक्शन सेंटर और डंपिंग यार्ड को ढंककर रखें। - संबित मिश्रा, आयुक्त, रायपुर
Updated on:
17 Aug 2026 06:55 pm
Published on:
17 Aug 2026 06:55 pm
