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गोबर के दीयों से रोशन हो रही महिलाओं की जिंदगी, हर दिवाली 10 लाख का कारोबार, ऐसे लिखी आत्मनिर्भरता की कहानी

Diwali Special Business: दीपावली पर घरों को रोशन करने वाले गोबर के दीये अब महिलाओं की जिंदगी में भी खुशहाली का उजाला बिखेर रहे हैं। मां लक्ष्मी स्वसहायता समूह से जुड़ी महिलाएं गोबर के दीये और लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां बनाकर आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिख रही हैं।
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रायपुर

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Khyati Parihar

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हिमांशु शर्मा

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Updated: 8 Nov 2026, 7:21 AM IST

Chhattisgarh News

गोबर की मूर्तियां (फोटो सोर्स- पत्रिका)

रायपुर@हिमांशु शर्मा। Cow Dung Diya Business: दीपावली पर घरों को रोशन करने वाले दीये अब महिलाओं की जिंदगी में भी खुशहाली का उजाला बिखेर रहे हैं। गोबर से बने दीये ने मां लक्ष्मी स्वसहायता समूह से जुड़ी महिलाओं को आत्मनिर्भरता की नई राह दिखाई है। हर साल दिवाली के मौके पर समूह का कारोबार करीब 10 लाख रुपए तक पहुंच जाता है। खास बात यह है कि इस कारोबार से महिलाएं लाखों रुपए तक की कमाई कर रही हैं।

रायपुर, आरंग सहित प्रदेश के अलग-अलग इलाकों में समूह के उत्पादों की मांग है। जिला पंचायत रायपुर से जुड़ी महिलाएं इसे अब देशभर तक इस बिजनेस को फैलाएगी। हर सालों इन्हें लाखों दिए के ऑर्डर मिलते है। समूह की महिला ने बताया कि सिर्फ दिवाली में ही दस लाख दिए बेच देते है।

पंचगव्य से निर्मित, लक्ष्मी-गणेश के मूर्ति का चलन

संतोषी नगर स्थित गौठान में गोबर के आकर्षक दीये और देवी-देवताओं की मूर्तियां तैयार होती है। संचालक रितेश अग्रवाल ने बताया कि हर साल इसकी हजारों डिमांड बढ़ती जा रही है। इस साल भी उन्हें हजारों की संख्या में ऑर्डर मिले है। इसमें पंचगव्य से निर्मित ( गोबर, गौमूत्र, दूध, दही, घी, गोबर) लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां हैं। इसे दीपावली पर घरों और प्रतिष्ठानों में पूजन के लिए इन मूर्तियों को पसंद किया जा रहा है।

पर्यावरण के अनुकूल होने से डिमांड बढ़ी

संचालक ने बताया कि पर्यावरण के अनुकूल और पारंपरिक उत्पाद होने के कारण इनकी मांग लगातार बनी हुई है। महिलाएं ग्राहकों की पसंद के अनुसार अलग-अलग आकार और डिजाइन के दीये व मूर्तियां तैयार करती हैं। एक मू्र्ति को तैयार होने, कलर (सूखने तक) करीब दस दिन का वक्त लग जाता है।

गोठान बना रोजगार का केंद्र

गोठान अब केवल पशुधन प्रबंधन तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि ग्रामीण महिलाओं के लिए रोजगार और स्वरोजगार के केंद्र भी बन रहे हैं। गोबर जैसे स्थानीय संसाधन को उपयोगी उत्पाद में बदलकर महिलाएं अपनी आय बढ़ा रही हैं। समूह की महिलाएं मिलकर उत्पादन, सजावट और ऑर्डर की आपूर्ति का काम संभालती हैं।

परंपरा के साथ आत्मनिर्भरता की रोशनी

दिवाली के बाजार में इन उत्पादों की बढ़ती मांग महिला सशक्तीकरण की एक प्रेरक तस्वीर पेश करती है। जहां एक ओर गोबर और पंचगव्य से बने उत्पादों के जरिए पारंपरिक संस्कृति को बढ़ावा मिल रहा है, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक मजबूती भी मिल रही है। मिट्टी और मोम के दीयों के बीच गोबर के दीयों की यह चमक अब महिलाओं के आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता की पहचान बनती जा रही है।