
रावण दहन (Photo Patrika)
Dussehra Special: @ गुंजन परमार। क्या आपने कभी सोचा है कि जिस रावण का पुतला हम हर साल जलाते हैं, वह तो चंद मिनटों में खाक हो जाता है, लेकिन हमारे भीतर सुलगने वाली आधुनिक युग की बुराइयां हर दिन हमें अंदर से क्यों जला रही हैं। विजयादशमी का पर्व केवल असत्य पर सत्य की जीत का जश्न नहीं है, बल्कि यह अपने भीतर झांककर खुद की कमियों को सुधारने का सबसे बड़ा अवसर है। आज की जेन-जी पीढ़ी के सामने कोई पारंपरिक रावण नहीं, बल्कि ऐसी 10 नई और अदृश्य चुनौतियां खड़ी हैं, जो दीमक की तरह उनके मानसिक स्वास्थ्य, धैर्य और रिश्तों को खोखला कर रही हैं। इस दशहरे पर हमारा संकल्प केवल कागजी पुतला जलाने का नहीं, बल्कि इन आधुनिक मानसिक विकारों को मात देने का होना चाहिए।
अति-स्क्रीन टाइम: एक हालिया डिजिटल वेलनेस सर्वे के अनुसार, 18 से 25 वर्ष के युवा औसतन रोजाना 6 से 7 घंटे मोबाइल स्क्रीन पर बिता रहे हैं।
मानसिक स्वास्थ्य पर असर: पिछले कुछ वर्षों में देश के युवाओं में एंग्जायटी, ओवरथिंकिंग और डिप्रेशन के मामलों में 35% तक की तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
अधैर्य: इंस्टेंट ग्रैडिफिकेशन के चलते युवाओं में सहनशक्ति का स्तर तेजी से गिर रहा है।
ओवरथिंकिंग: छोटी-छोटी बातों को बार-बार सोचकर बेवजह मानसिक तनाव और पैनिक बढ़ाना।
सोशल मीडिया की तुलना: दूसरों की एडिटेड और झूठी दिखावटी जिंदगी से अपनी सामान्य जिंदगी की तुलना कर हीनभावना पालना।
असफलता का डर: सिर्फ हार के डर से किसी नए अवसर या काम की शुरुआत ही न करना।
कॅरियर का दबाव: समाज और परिवार से थोपा गया हर हाल में सफल होने का ऐसा प्रेशर जो डिप्रेशन की ओर धकेल रहा है।
तुरंत सब पाने की चाह: बिना मेहनत और लंबे संघर्ष के शॉर्टकट से सब कुछ रातों-रात हासिल करने की जिद।
धैर्य की कमी: मनचाही चीज या परिणाम न मिलने पर तुरंत चिड़चिड़ाना, गुस्सा होना या निराश हो जाना।
गुस्सा और असहनशीलता: छोटी-छोटी असहमति पर भी आक्रामक प्रतिक्रिया देना और संवादहीनता बढ़ाना।
दिखावे की होड़: महंगे गैजेट्स और ब्रांडेड लाइफस्टाइल से समाज में खुद को श्रेष्ठ साबित करने का पाखंड।
मोबाइल की निर्भरता: स्क्रीन से इस कदर चिपकना कि वास्तविक दुनिया और शारीरिक खेलों से पूरी तरह नाता टूट जाना।
आत्मविश्वास की कमी: अपनी वास्तविक खूबियों को कम आंकना और हमेशा सोशल मीडिया के 'लाइक और अप्रूवल' पर निर्भर रहना।
आज के युवाओं और बच्चों में धैर्य की भारी कमी है, वे हर चीज का रिजल्ट तुरंत चाहते हैं। इसके मूल में उनकी परवरिश है। बचपन में बच्चों की हर मांग तुरंत पूरी कर देना या चुप कराने के लिए हाथ में मोबाइल थमा देना उनकी सहनशीलता को कमजोर कर देता है।
-डॉ. उषाकिरण अग्रवाल, प्रसिद्ध मनोचिकित्सक
स्कूल-कॉलेज स्तर पर नियमित काउंसलिंग और मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता आज की सबसे बड़ी अनिवार्यता है। जब तक हम युवाओं को अपनी भावनाएं स्वस्थ तरीके से व्यक्त करना नहीं सिखाएंगे, वे वर्चुअल दुनिया के दबाव से बाहर नहीं आ पाएंगे।
-डॉ. हिना चावड़ा, मनोचिकित्सक
डोपामाइन डिटॉक्स: हफ्ते में कम से कम एक दिन या रोज रात को सोने से 2 घंटे पहले मोबाइल और सोशल मीडिया से पूरी तरह दूरी बनाएं। 20-20-20 स्क्रीन नियम: पढ़ाई या काम के दौरान हर 20 मिनट के बाद स्क्रीन से नजरें हटाकर 20 फीट दूर किसी वस्तु को 20 सेकंड तक देखें।
10-मिनट पॉज रूल: जब भी गुस्सा आए या तुरंत आक्रामक प्रतिक्रिया देने का मन हो, तो 10 मिनट रुकें, गहरी सांस लें और फिर सोचें।
बड़े प्रोजेक्ट्स या करियर का एकमुश्त तनाव लेने के बजाय, काम को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटकर पूरा करें। सोशल कंपेरिजन बंद करें: यह समझें कि लोग सोशल मीडिया पर केवल 'हाइलाइट रील्स' दिखाते हैं, संघर्ष नहीं। अपनी तुलना दूसरों से करना छोड़ें। प्रोफेशनल हेल्प लें: यदि तनाव या एंग्जायटी दैनिक जीवन को प्रभावित करने लगे, तो बिना झिझक मनोचिकित्सक या काउंसलर की मदद लें।
Updated on:
20 Oct 2026 12:33 pm
Published on:
20 Oct 2026 12:33 pm
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