
छत्तीसगढ़ से आसमान तक उड़ान (फोटो सोर्स- पत्रिका)
रायपुर@ताबीर हुसैन। Indian Air Force Day 2026: छत्तीसगढ़ के छोटे शहरों और गांवों के युवाओं में वायुसेना में करियर बनाने की रुचि बढ़ रही है, लेकिन चयन की राह अब भी कई चुनौतियों से घिरी है। आवेदन की पात्रता, अंग्रेजी में न्यूनतम अंक, परीक्षा का बढ़ता स्तर और चयन के अलग-अलग चरणों के लिए दूसरे राज्यों की यात्रा आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों के लिए बड़ी बाधा बन रही है। विशेषज्ञ आरके साहू के प्रशिक्षण अनुभव के मुताबिक, प्रदेश से हर साल अग्निवीर वायु में करीब 25 से 30 युवाओं का चयन होता है, जबकि 2025 में यह संख्या करीब 15 रही।
एयरफोर्स में जाने के इच्छुक विद्यार्थियों के सामने पहली चुनौती आवेदन की पात्रता है। अग्निवीर वायु के लिए अंग्रेजी में न्यूनतम 50 प्रतिशत अंक की अनिवार्यता कई विद्यार्थियों के लिए बाधा बनती है। कई स्कूलों में बेहतर परिणाम के लिए विद्यार्थियों को अंग्रेजी के बजाय दूसरे विषय लेने की सलाह दी जाती है।
ऐसे में 12वीं में अच्छे अंक होने के बावजूद विद्यार्थी आवेदन नहीं कर पाते। आवेदन शुल्क भी आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए चुनौती बनता है। इसके बाद गणित, अंग्रेजी, भौतिकी और रसायन विज्ञान की लिखित परीक्षा, अंग्रेजी में एसआरटी और ग्रुप डिस्कशन जैसे चरणों से गुजरना पड़ता है। छोटे शहरों के विद्यार्थियों को कई बार इन चरणों की जानकारी समय पर नहीं मिल पाती।
लिखित परीक्षा में सफल अभ्यर्थियों को शारीरिक परीक्षण के लिए भोपाल, इंदौर या जबलपुर जैसे शहरों तक जाना पड़ सकता है। मेडिकल के लिए पुणे, नासिक और बेंगलुरु जैसे शहरों की यात्रा करनी पड़ती है। आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों के लिए यात्रा और रहने का खर्च भी चुनौती बन जाता है।
आधुनिक वायुसेना अब केवल फाइटर जेट उड़ाने तक सीमित नहीं है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ड्रोन, साइबर सिक्योरिटी, कम्युनिकेशन सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक्स, डेटा एनालिसिस, एविएशन टेक्नोलॉजी और एडवांस इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों की भूमिका बढ़ रही है। विशेषज्ञ के अनुसार, ऑपरेशन सिंदूर सहित हाल के सैन्य अभियानों ने आधुनिक युद्ध में तकनीक और एआई की बढ़ती भूमिका को सामने रखा है। ऐसे में विद्यार्थियों को रक्षा परीक्षाओं के साथ गणित, भौतिकी, कंप्यूटर, इलेक्ट्रॉनिक्स, अंग्रेजी और तकनीकी कौशल पर भी पकड़ मजबूत करनी चाहिए।
गुढ़ियारी निवासी सौरभ तिवारी के पिता निजी फैक्ट्री में सामान्य नौकरी करते हैं। सौरभ का सपना फौज में जाने का था, लेकिन कम हाइट के कारण कई भर्तियों में चयन नहीं हो पाया। उन्होंने एयरफोर्स की परीक्षा तीन बार और नेवी की दो बार दी। कई बार कुछ अंकों से मेरिट में जगह नहीं बना पाए। इसके बावजूद कोशिश जारी रखी और आखिरकार एयरफोर्स में चयन हासिल किया।
बिल्हा निवासी जयंत सोनवानी के पिता ऑटो चलाते थे। आर्थिक स्थिति कमजोर थी और जयंत की अंग्रेजी भी कमजोर थी। नेवी से सेवानिवृत्त अधिकारी से मार्गदर्शन लेकर तैयारी शुरू की। एनडीए में पहले लिखित परीक्षा में असफल हुए, फिर लिखित परीक्षा पास कर एसएसबी में बाहर हुए। अगली बार एसएसबी के कॉन्फ्रेंस चरण में बाहर हुए। नेवी और एयरफोर्स की मेरिट में भी जगह नहीं बना पाए।
मेडिकल में नॉक-नी, फ्लैट फुट, माइनस 1.5 नंबर का चश्मा और हाथों के एंगल की समस्या भी सामने आई। इसी बीच पिता का निधन हो गया। परिवार चलाने के लिए जोमैटो में डिलीवरी बॉय और रात में नंबर प्लेट बनाने वाली फैक्ट्री में काम किया। आखिरकार एयरफोर्स की अंतिम मेरिट में चयन हुआ। वर्तमान में चेन्नई में पोस्टेड हैं।
अभनपुर के बिरोंदा गांव के भूपेंद्र साहू के पिता किसान हैं। बहन के मुताबिक, भूपेंद्र दिन-रात मोबाइल पर फ्री-फायर गेम खेलते रहते थे। इस लत से निकालने के लिए बहन ने उनसे कहा, ‘नकली फाइटर बनने से अच्छा है असली फाइटर बनो।’ यही बात भूपेंद्र के लिए प्रेरणा बन गई। उन्होंने फोर्स में जाने की तैयारी शुरू की।
आर्मी टेक्निकल में असफल हुए, नेवी में भी पहली बार सफल नहीं हुए। दूसरी कोशिश में नेवी में चयन हुआ और ट्रेनिंग शुरू की। नेवी की आधी ट्रेनिंग पूरी करने के बाद भी एयरफोर्स में जाने का सपना नहीं छोड़ा। आखिरकार एयरफोर्स में चयन हुआ और उन्होंने अपना लक्ष्य हासिल कर लिया।
Updated on:
08 Oct 2026 11:39 am
Published on:
08 Oct 2026 11:39 am
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