
टोंक बस स्टैण्ड पर यात्रियों के इंतेजार के लिए खड़ी रोडवेज।
बिना यात्रियों के ही रोडवेज को सालाना 25 लाख की चपत
बस स्टैण्ड व कार्यशाला के बीच पांच किलोमीटर की दूरी
प्रतिमाह बच सकता है 3 हजार लीटर डीजल
टोंक आगार को फटका
टोंक. बस स्टैण्ड से आगार कार्यशाला के बीच पांच किलोमीटर की दूरी आगार के घाटे में ‘कोढ़ में खाज’ साबित हो रही है। चौकाने वाली बात है कि स्टैण्ड से आगार कार्यशाला तक बसों की आवाजाही में ही हर माह निगम को दो लाख से अधिक की चपत लग रही है।
यानि की हर साल निगम के २५ लाख रुपए तो बस के आगार से निकलकर बस स्टैण्ड तक पहुंचने में ही फुंक रहे हैं। टोंंक आगार कार्यशाला से बस स्टैण्ड की दूरी पांच किलोमीटर के करीब है। प्रतिदिन बस कार्यशाला से निकलकर बस स्टैण्ड पहुंचती है। इसके बाद निर्धारित स्थान पर जाकर फिर से शाम को कार्यशाला में जमा होती हैै।
इससे प्रत्येक बस को दस किलोमीटर की अतिरिक्त फेरी लगानी पड़ रही है। जबकि बेड़े में ७१ रोडवेज की व २८ अनुबन्धित बसें संचालित है। इससे डीजल, मरम्मत व टायरों को लेकर निगम को प्रतिवर्ष ३० लाख का चूना लग रहा है। निगम अधिकारी भी इस बात को स्वीकार रहे है कि बस स्टैण्ड, कार्यशाला एक ही स्थान पर हो तो निगम के ३० लाख रुपए सालाना बचाए जा सकते हैं।
इससे निगम को घाटे से उबारा जा सकता है। अधिकारियों के मुताबिक बस स्टैण्ड के पास ही आगार की करीब तीन बीघा ८ बिस्वा भूमि भी उपलब्ध है।
डिपो जाने की मजबूरी
चालक, परिचालकों का कहना है कि स्टैण्ड से विभिन्न आगारों की डेढ़ सौ से अधिक बसों का संचालन होता है। इनमें से किसी भी आगार की बस में खराबी आने पर चालक को पांच किलोमीटर का अतिरिक्त फेरा लगाकर बस को दुरुस्त कराने डिपो जाना पड़ता है। इससे उस आगार को भी राजस्व नुकसान झेलना पड़ता है।
फैक्ट फाइल
७१ बसें टोंक आगार में
२८ बसें अनुबन्धित
३५ हजार किलोमीटर प्रतिदिन संचालन का लक्ष्य
५- किलोमीटर की दूरी कार्यशाला से बसस्टैण्ड की
१५- हजार ६०० किलोमीटर की हर माह अतिरिक्त फेरी
३००० लीटर डीजल अतिरिक्त खर्च प्रति माह
२५,२६२९१ लाख की चपत हर साल
कार्यशाला का निर्माण भी बस स्टैण्ड के पास ही कराने का प्रस्ताव भेजा हुआ है। दोनों एक स्थान पर हो तो रोडवेज का लाखों का घाटा पाटा जा सकता है।
रामचरण गोचर, मुख्य आगार प्रबन्धक टोंक।
Published on:
4 Feb 2018, 1:41 PM IST
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