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अलवर जिला प्रमुख चुनाव: कांग्रेस का गढ़ ढहाएगी BJP या दोहराया जाएगा 20 साल का इतिहास?

अलवर जिला प्रमुख (Zila Pramukh) की कुर्सी पर 20 साल से बरकरार कांग्रेस के दबदबे को तोड़ने के लिए भाजपा (BJP) ने पूरी ताकत झोंक दी है। नए परिसीमन (Delimitation) के बाद 39 वार्डों वाली जिला परिषद में कांग्रेस इतिहास दोहराने और भाजपा नया समीकरण गढ़ने की जुगत में लगी है।
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अलवर

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Rajendra Banjara

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Updated: 30 Oct 2026, 12:39 PM IST

alwar zila pramukh chunav

representative picture (patrika)

प्रदेश में सत्ता भाजपा की रही हो या कांग्रेस की, अलवर जिला परिषद में जिला प्रमुख की कुर्सी पर कांग्रेस ने दबदबा बनाए रखा। वर्ष 2003 से 2018 के बीच दो बार भाजपा और दो बार कांग्रेस की सरकार बनी, लेकिन भाजपा जिला प्रमुख की सीट पर अपना उम्मीदवार नहीं बैठा सकी। अब एक बार फिर प्रदेश में भाजपा की सरकार है और पार्टी जिला प्रमुख बनाने का दावा कर रही है। दूसरी ओर, कांग्रेस अपने पुराने सियासी अनुभव के दम पर भाजपा की राह रोकने की रणनीति में जुट गई है।

पार्टी सभी पार्षद प्रत्याशियों को एकजुट कर जिला प्रमुख की कुर्सी पर कब्जा बरकरार रखने की कोशिश कर रही है। ऐसे में इस बार जिला प्रमुख का चुनाव केवल संख्या बल का नहीं, बल्कि पुराने सियासी इतिहास को दोहराने और बदलने की लड़ाई भी बन गया है। इस बार नए जिलों के कारण अलवर जिला परिषद में वार्डों की संख्या 39 रह गई है। परिसीमन हुआ है।

कब कौन बना जिला प्रमुख

  • वर्ष 2003 में भाजपा की सरकार बनी। उसके बाद वर्ष 2005 में हुए जिला प्रमुख के चुनाव में कांग्रेस के टीकाराम जूली विजयी हुए।
  • वर्ष 2008 में कांग्रेस की सरकार बनी। पंचायत चुनाव 2010 में हुए, तो कांग्रेस की सफिया खान जिला प्रमुख बनीं।
  • वर्ष 2013 में भाजपा की सरकार बनी। वर्ष 2015 में हुए पंचायत चुनाव में कांग्रेस की रेखा यादव जिला प्रमुख चुनी गईं।
  • वर्ष 2018 में कांग्रेस की सरकार में पंचायत चुनाव 2021 में हुए, जिसमें कांग्रेस के ही बलबीर छिल्लर जिला प्रमुख बने। हालांकि बाद में छिल्लर भाजपा में शामिल हो गए।

हर बार नया चेहरा, किसी को दूसरी पारी नहीं

जिला परिषद के हर कार्यकाल में नया चेहरा सामने आया। किसी को भी दोबारा जिला प्रमुख बनने का अवसर नहीं मिला। वर्ष 1985 से यही सिलसिला चलता आ रहा है। कुछ मजबूत दावेदार थे, लेकिन कुर्सी का आरक्षण बदलने से उनके ख्वाब पूरे नहीं हो पाए। राजनीतिक दलों ने भी जनता का मिजाज भांप लिया था कि वह दोबारा इस सीट पर वही चेहरा बर्दाश्त नहीं करने वाले।

इसी को देखते हुए दलों ने आरक्षण की िस्थति अनुकूल होने के बाद भी वर्तमान जिला प्रमुखों को दरकिनार करते हुए नए चेहरों को मैदान में उतारा। इस बार भी जिला प्रमुख के लिए दोनों ही दलों में प्रत्याशियों को लेकर घमासान शुरू हो गया है। ऐसे में क्रॉस वोटिंग को लेकर भी खेल हो सकता है। इसी तरह प्रधान की कुर्सी को लेकर भी चल रहा है।