
representative picture (patrika)
प्रदेश में सत्ता भाजपा की रही हो या कांग्रेस की, अलवर जिला परिषद में जिला प्रमुख की कुर्सी पर कांग्रेस ने दबदबा बनाए रखा। वर्ष 2003 से 2018 के बीच दो बार भाजपा और दो बार कांग्रेस की सरकार बनी, लेकिन भाजपा जिला प्रमुख की सीट पर अपना उम्मीदवार नहीं बैठा सकी। अब एक बार फिर प्रदेश में भाजपा की सरकार है और पार्टी जिला प्रमुख बनाने का दावा कर रही है। दूसरी ओर, कांग्रेस अपने पुराने सियासी अनुभव के दम पर भाजपा की राह रोकने की रणनीति में जुट गई है।
पार्टी सभी पार्षद प्रत्याशियों को एकजुट कर जिला प्रमुख की कुर्सी पर कब्जा बरकरार रखने की कोशिश कर रही है। ऐसे में इस बार जिला प्रमुख का चुनाव केवल संख्या बल का नहीं, बल्कि पुराने सियासी इतिहास को दोहराने और बदलने की लड़ाई भी बन गया है। इस बार नए जिलों के कारण अलवर जिला परिषद में वार्डों की संख्या 39 रह गई है। परिसीमन हुआ है।
जिला परिषद के हर कार्यकाल में नया चेहरा सामने आया। किसी को भी दोबारा जिला प्रमुख बनने का अवसर नहीं मिला। वर्ष 1985 से यही सिलसिला चलता आ रहा है। कुछ मजबूत दावेदार थे, लेकिन कुर्सी का आरक्षण बदलने से उनके ख्वाब पूरे नहीं हो पाए। राजनीतिक दलों ने भी जनता का मिजाज भांप लिया था कि वह दोबारा इस सीट पर वही चेहरा बर्दाश्त नहीं करने वाले।
इसी को देखते हुए दलों ने आरक्षण की िस्थति अनुकूल होने के बाद भी वर्तमान जिला प्रमुखों को दरकिनार करते हुए नए चेहरों को मैदान में उतारा। इस बार भी जिला प्रमुख के लिए दोनों ही दलों में प्रत्याशियों को लेकर घमासान शुरू हो गया है। ऐसे में क्रॉस वोटिंग को लेकर भी खेल हो सकता है। इसी तरह प्रधान की कुर्सी को लेकर भी चल रहा है।
Updated on:
30 Oct 2026, 12:39 PM IST
Published on:
30 Oct 2026, 12:39 PM IST
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