ये 15 सीटें भाजपा के लिए चुनौती, कांग्रेस की राह में भी कई मुश्किलें, डैमेज कंट्रोल में जुटे दिग्गज

28 सीटों पर 3 नवंबर को वोटिंग होनी है और परिणाम 10 नवंबर को आएंगे।

भाजपा ने सभी सीटों पर उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं जबकि कांग्रेस ने अभी तक 27 सीटों पर उम्मीदवारों के नाम की घोषणा की है।

 

By: Pawan Tiwari

Published: 08 Oct 2020, 09:31 AM IST

भोपाल. दल-बदल से बदले प्रदेश के सियासी समीकरणों को साधना भाजपा-कांग्रेस दोनों के लिए आसान नहीं है। टिकटों के बंटवारे के बाद तो स्थिति और विकट है। भाजपा ने कांग्रेस से आए नेताओं को ही उम्मीदवार बनाया है, ऐसे में स्थानीय नेता बगावत पर उतर आए हैं। कुछ कसक 2018 के विधानसभा चुनाव की भी है। स्थिति यह है कि भाजपा का पूरा फोकस डैमेज कंट्रोल पर है। पार्टी ने हर सीट पर बागियों को मनाने के लिए नेताओं की तैनाती की है। कहीं पर निगम या मंडल में एडजस्ट करने का दांव खेला गया है तो कहीं पार्टी में ही कोई पद दिलाने का वादा किया गया है।

जीत की राह निकालने के लिए सत्ता और संगठन यहां रूठे नेताओं को साधने की कोशिश कर रहा है। ऐसे ही कांग्रेस ने पूर्व मंत्रियों को विधानसभा प्रभारी बनाकर जिम्मेदारी दी है। 4 विधायकों को एक सीट जिताने का जिम्मा दिया गया है, वहीं, पूर्व सीएम कमल नाथ सभी सीटों पर माइक्रो मैनेजमेंट से लेकर बूथ प्रबंधन तक नजर रखे हुए हैं।

दावेदोरों में ज्यादा असंतोष
भाजपा में सबसे ज्यादा असंतोष उन सीटों पर है जहां पहले से ही कई दावेदार थे। सांची विधानसभा सीट पर भाजपा को भितरघात की आशंका है। यहां हमेशा भाजपा से डॉ गौरीशंकर शेजवार दावेदार रहे हैं। 2018 के विधानसभा चुनाव में अपने बेटे मुदित शेजवार को स्थापित करने के लिए गौरी शंकर शजवार ने चुनाव नहीं लड़ा था। लेकिन मुदित कांग्रेस के डॉ प्रभुराम चौधरी से अपना चुनाव हार गए थे। लेकिन अब प्रभुराम चौधरी भाजपा में हैं ऐसे में भितरघात का खतरा हो सकता है।

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बदनावर: विधानसभा में भाजपा के पूर्व विधायक भंवर सिंह शेखावत पहले ही मोर्चा खोल चुके हैं। वहीं, अभिषेक सिंह का टिकट कटने के बाद कांग्रेस के खेमे भी भी नाराजगी है।

शिवपुरी: भितरघात का खतरा वैसे तो दोनों पार्टियों में है लेकिन भाजपा में खींचतान ज्यादा है। कई नेता कांग्रेस छोड़कर भाजपा मं शामिल हुए हैं। दूसरी ओर कांग्रेस अभी अपने पराए की तलाश कर रही है। पोहरी से भाजपा प्रत्याशी तो करैरा से कांग्रेस उम्मीदवार के लिए मुश्किलें हो सकती हैं।

मुरैना: अंदरूनी कलह की तलवार कांग्रेस और भाजपा दोनों पर लटक रही है। भाजपा में जौरा को छोड़कर बाकी जगह विरोध दबा हुआ है।

भिंड: गोहद और मेहगांव में जो प्रत्याशी उतारे हैं वह कांग्रेस से भाजपा में शामिल हुए हैं। ऐसे में पहले से चुनाव की तैयारी में लगे भाजपा के बड़े नेता इन उम्मीदवारों को हराने की कवायद अंदरूनी तौर पर कर रहे हैं।

डबरा: यहां भाजपा के मूल कार्यकर्ता की पूछ परख नहीं है। 15 महीने की कांग्रेस सरकार में कई भाजपा नेता इमरती देवी के कोप का भाजन बनकर नुकसान उठा चुके हैं। वर्तमान परिस्थितियों में ज्योतिरादित्य सिंधिया ब्रिगेड भाजपा के मूल कार्यकर्ताओं पर भरोसा नहीं कर पा रहा है। जिसका भुगतान भाजपा में रहते हुए भी इमरती देवी को हो सकता है।

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यहां भी मुश्किलें
बमोरी विधानसभा सीट दोनों पार्टियों में दल-बदलू हैं। भाजपा में कोई खुलकर सामने नहीं आया पर भितरघात की आशंका तो है। अनूपपुर में कांग्रेस से भाजपा में आए बिसाहूलाल को मैदान में उतारने के बाद अब अंतर्कलह बढ़ गया है। मांधाता में भाजपा ने कांग्रेस से आए नारायण पटेल को उतारा हैय़ यहां विरोध कम करनेके लिए सीएम खुद दौरा करने वाले हैं। नेपानगर में कांग्रेस से आई सुमित्रा कास्डेकर को को भाजपा से टिकट मिलने पर पूर्व विधायक मंजू दादू और उनके समर्थकों ने विरोध जताया है।


मालवा-निमांड में भी मुश्किलें
भाजपा के बैनर तले भाग्य आजमा रहे पूर्व कांग्रेसियों के लिए मालवा में दो अहम सीटें हाटपिपलिया और सुवासरा हैं। सुवासरा में मंत्री हरदीप सिंह डंग तो हाटपिपलिया में मनोज चौधरी के प्रतिष्ठा दांव पर है। आगर में भाजपा ने नया चेहरा मनोज ऊंटवाल पर दांव खेला है।

हाटपिपलिया विधानसभा सीट: यहां पर मनोज चौधरी की राह में पूर्व मंत्री दीपक जोशी और उनके समर्थकों की नाराजगी परेशानी बनी हुई है। हालांकि हाल में ही दीपक जोशी सीएम शिवराज सिंह चौहान से मिलकर आने के बाद मनोज की जीत का दावा कर रहे हैं लेकिन समर्थकों की मैदानी कसरत कुछ और ही कहानी कह रही है।

सुवासरा विधानसभा सीट: मंदसौर की इस विधानसभा सीट पर मंत्री हरदीप सिंग डंग के लिए खुद सीएम सभाओं के जरिए विश्वास जगाने का प्रयास कर रहे हैं। भाजपा ने नुकसान की आशंका के चलते पूर्व विधायक राधेश्याम पाटीदार को चुनाव संचालक की कमान सौंपी है।

आगर-मालवा: यहां भाजपा ने मनोहर ऊंटवाल के बेटे मनोज को प्रत्याशी बनाकर बीता चुनाव कम अंतर से हारे कांग्रेस के विपिन वानखेड़े की राह मुश्किल कर दी है। मनोज ऊंटवाल के खिलाफ फिलहाल भाजपा में असंतोष नहीं है लेकिन यहां से दावा कर रहे स्थानीय नेताओं के रुख पर निर्भर करेगा कि भाजपा का नया चेहरा क्या रंग लाएगा।

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