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Chhattisgarh High Court: छत्तीसगढ़ में 8 रिटायर्ड कर्मचारियों की ग्रेच्युटी पर विवाद, हाईकोर्ट ने दिया नया निर्देश

Retired Government Employees: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने नियंत्रक प्राधिकारी को पहले तय करने का निर्देश दिया कि ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम 1972 इन कर्मचारियों पर लागू होता है या नहीं।
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Chhattisgarh High Court

8 रिटायर्ड कर्मचारियों की ग्रेच्युटी का मामला (Photo Source- Patrika File Photo)

Chhattisgarh High Court: छत्तीसगढ़ में जल संसाधन विभाग के आठ सेवानिवृत्त कर्मचारियों की बकाया ग्रेच्युटी का मामला हाईकोर्ट पहुंच गया है। कर्मचारियों का कहना है कि लंबे समय तक सेवा देने के बाद रिटायरमेंट पर उन्हें ग्रेच्युटी की कुछ राशि तो मिली, लेकिन बाकी रकम का भुगतान नहीं किया गया। इसके बाद उन्होंने नियंत्रक प्राधिकारी के समक्ष शिकायत की थी। प्राधिकारी ने विभाग को 30 दिन के भीतर बकाया राशि देने का आदेश दिया था। इसके बावजूद भुगतान नहीं होने पर कर्मचारी हाईकोर्ट पहुंचे।

मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति बिभु दत्ता गुरु ने संबंधित नियंत्रक प्राधिकारी को पहले यह तय करने का निर्देश दिया कि ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम, 1972 इन कर्मचारियों पर लागू होता है या नहीं। कोर्ट ने कहा कि इस सवाल पर दोनों पक्षों को सुनने के बाद कानून के अनुसार नया आदेश पारित किया जाए। इसके साथ ही सभी आठ याचिकाओं का निराकरण कर दिया गया।

Pending Gratuity Payment: 30 दिन में भुगतान का दिया गया था आदेश

याचिकाकर्ताओं के अनुसार, उन्होंने जल संसाधन विभाग में तीन दशक से अधिक समय तक काम किया। सेवानिवृत्त होने के बाद विभाग की ओर से ग्रेच्युटी की कुछ राशि का भुगतान किया गया, लेकिन शेष रकम रोक दी गई। बकाया राशि पाने के लिए कर्मचारियों ने ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम के तहत नियंत्रक प्राधिकारी के सामने आवेदन किया। इस पर 12 दिसंबर 2025 को विभाग को 30 दिन के भीतर बकाया ग्रेच्युटी देने का आदेश जारी किया गया था। आदेश में देरी होने पर कानून के अनुसार ब्याज देने की बात भी कही गई थी। कर्मचारियों का कहना था कि आदेश के बावजूद उन्हें बकाया राशि नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने आदेश का पालन कराने की मांग को लेकर हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर कीं।

राज्य सरकार ने उठाया अधिकार क्षेत्र का सवाल

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से नियंत्रक प्राधिकारी के अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाया गया। सरकार की दलील थी कि ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम, 1972 की धारा 2(ई) में केंद्र और राज्य सरकार के कर्मचारियों को ‘कर्मचारी’ की परिभाषा से बाहर रखा गया है। राज्य के अनुसार, यदि संबंधित कर्मचारी इस अधिनियम के दायरे में नहीं आते हैं, तो नियंत्रक प्राधिकारी को उनके मामलों में इसी कानून के तहत सुनवाई करने और भुगतान का आदेश देने का अधिकार नहीं था। इसी आधार पर सरकार ने आदेश का पालन कराने के लिए दायर याचिकाओं की स्वीकार्यता पर भी आपत्ति जताई।

Water Resources Department: हाईकोर्ट ने पहले कानून लागू होने की स्थिति स्पष्ट करने को कहा

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की आपत्ति को महत्वपूर्ण माना। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता राज्य सरकार के कर्मचारी हैं, इसलिए पहले यह विचार करना जरूरी है कि ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम उनके दावों पर लागू होता है या नहीं। कोर्ट ने संबंधित नियंत्रक प्राधिकारी को निर्देश दिया कि वह दोनों पक्षों को सुनने के बाद अपने अधिकार क्षेत्र और अधिनियम की लागू होने की स्थिति पर कानून के अनुसार उचित आदेश पारित करे। इस तरह हाईकोर्ट ने बकाया ग्रेच्युटी के भुगतान का सीधा आदेश देने के बजाय मामले में पहले कानूनी अधिकारिता का सवाल तय करने को कहा है।

इन आठ कर्मचारियों ने दायर की थीं याचिकाएं

इस मामले में सुखराम विश्वकर्मा (70), नरेंद्र सिंह कौशिक (64), रामनाथ रात्रे (68), जयप्रकाश उपाध्याय (70), मोहित राम साहू (73), शत्रुहन प्रसाद कौशिक (72), राजकुमार श्रीवास (67) और शत्रुहन लाल श्रीवास (65) ने अलग-अलग याचिकाएं दायर की थीं। सभी याचिकाकर्ता जल संसाधन विभाग में लंबे समय तक सेवा देने के बाद सेवानिवृत्त हुए हैं। अब उनके मामलों में नियंत्रक प्राधिकारी को कानून की लागू होने की स्थिति और अपने अधिकार क्षेत्र पर निर्णय लेना होगा।