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शहडोल की विवादित जमीन पर छत्तीसगढ़ में होगी सुनवाई, हाईकोर्ट ने सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र को माना सही

MCB district land dispute: मध्य प्रदेश के शहडोल की जमीन से जुड़े विवाद पर छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने अहम फैसला दिया। कोर्ट ने कहा कि एक ही विवाद की संपत्तियों में से कोई एक जमीन संबंधित अदालत की सीमा में हो तो वहां पूरा केस चल सकता है।
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MP Land Dispute

MP की विवादित जमीन का छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में होगा फैसला (Photo Source- Patrika File Photo)

MP Land Dispute: मध्य प्रदेश के शहडोल जिले की जमीन से जुड़े विवाद में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने अदालत के अधिकार क्षेत्र को लेकर अहम फैसला दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगर एक ही विवाद से जुड़ी कई अचल संपत्तियां अलग-अलग न्यायालयों की सीमा में स्थित हैं, तो उन संपत्तियों में से किसी एक के क्षेत्र की अदालत में पूरा मुकदमा चलाया जा सकता है। इस मामले में शहडोल जिले की जमीन को लेकर विवाद था, लेकिन उसी विवाद से जुड़ी कुछ दूसरी जमीनें छत्तीसगढ़ के मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले में स्थित हैं। इसी आधार पर जनकपुर की सिविल अदालत में दायर मुकदमे को हाई कोर्ट ने अधिकार क्षेत्र से बाहर नहीं माना।

Chhattisgarh High Court judgment: जमीन पर हक, बंटवारे और रोक की मांग

मामला मध्य प्रदेश के शहडोल जिले के दरैन गांव की जमीन के साथ छत्तीसगढ़ के घटई और खरिका टोला गांव की जमीन से जुड़ा है। बिरेंद्र कुमार ने इन संपत्तियों को लेकर जनकपुर की सिविल अदालत में सिविल वाद दायर किया था। इस मुकदमे में जमीन पर अधिकार घोषित करने, संपत्ति के बंटवारे और स्थायी रोक लगाने की मांग की गई थी। विवाद में शामिल तीनों स्थानों में से दरैन गांव शहडोल जिले में आता है, जबकि घटई और खरिका टोला छत्तीसगढ़ के मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले में हैं।

याचिकाकर्ताओं ने उठाया था कोर्ट के अधिकार का सवाल

शहडोल निवासी बृजेंद्रनाथ कुशवाहा सहित छह याचिकाकर्ताओं ने जनकपुर की अदालत में चल रहे मामले के अधिकार क्षेत्र पर आपत्ति जताई थी। उनका कहना था कि दरैन गांव की जमीन मध्य प्रदेश में स्थित है और वह उनकी स्वयं अर्जित संपत्ति है। इसलिए इस जमीन से जुड़े मामले की सुनवाई छत्तीसगढ़ की अदालत में नहीं हो सकती। इसी आधार पर उन्होंने सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 16 के तहत आवेदन दिया था। हालांकि जनकपुर की सिविल अदालत ने 10 अगस्त 2026 को उनका आवेदन खारिज कर दिया था।

हाई कोर्ट ने जनकपुर कोर्ट के आदेश को सही माना

जनकपुर की अदालत के फैसले के खिलाफ याचिकाकर्ताओं ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का रुख किया। जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की अदालत ने मामले की सुनवाई करते हुए जनकपुर सिविल कोर्ट के आदेश को सही माना और छह याचिकाकर्ताओं की याचिका खारिज कर दी। हाई कोर्ट ने कहा कि इस मामले में केवल दरैन गांव की जमीन को अलग करके नहीं देखा जा सकता। विवाद से जुड़ी अन्य संपत्तियां भी हैं और उनमें से कुछ जनकपुर अदालत के क्षेत्राधिकार में आती हैं।

धारा 17 के तहत समझा अधिकार क्षेत्र

हाई कोर्ट ने सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 17 का उल्लेख करते हुए कहा कि जब एक ही विवाद से जुड़ी कई अचल संपत्तियां अलग-अलग अदालतों की क्षेत्रीय सीमा में स्थित हों, तो पूरा मुकदमा उस अदालत में दायर किया जा सकता है, जिसकी सीमा में उन संपत्तियों में से कोई एक स्थित हो। इसका मतलब यह है कि हर संपत्ति के लिए अलग-अलग अदालत में अलग मुकदमा चलाना जरूरी नहीं है, बशर्ते मामला कानून में तय शर्तों के तहत आता हो।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी दिया हवाला

हाई कोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के शिवनारायण बनाम मणिकलाल मामले में दिए गए फैसले का भी उल्लेख किया। इस फैसले में भी अलग-अलग न्यायालयों के क्षेत्र में स्थित संपत्तियों से जुड़े एक ही विवाद की सुनवाई को लेकर यही कानूनी सिद्धांत सामने आया था। हाई कोर्ट ने इसी कानूनी स्थिति को वर्तमान मामले पर लागू किया।

घटई और खरिका टोला की जमीन बनी आधार

अदालत ने पाया कि घटई और खरिका टोला की जमीन जनकपुर सिविल कोर्ट की क्षेत्रीय सीमा में आती है। चूंकि ये दोनों जमीनें उसी विवाद का हिस्सा हैं, इसलिए जनकपुर की अदालत में पूरा मुकदमा चलाना अधिकार क्षेत्र से बाहर नहीं माना जा सकता। अदालत ने इसी आधार पर याचिकाकर्ताओं की आपत्ति को स्वीकार नहीं किया और उनकी याचिका खारिज कर दी।

क्या है इस फैसले का मतलब

इस मामले का मुख्य सवाल यह था कि जब एक ही संपत्ति विवाद से जुड़ी जमीनें अलग-अलग राज्यों या अदालतों के क्षेत्र में हों, तो मुकदमा किस अदालत में चल सकता है। हाई कोर्ट ने कहा कि कानून के तहत ऐसी स्थिति में उन संपत्तियों में से किसी एक के क्षेत्र की सक्षम अदालत में पूरा मुकदमा चलाया जा सकता है। इस मामले में दरैन की जमीन मध्य प्रदेश में होने के बावजूद घटई और खरिका टोला की जमीन जनकपुर अदालत की सीमा में आती है। इसलिए जनकपुर की सिविल अदालत में चल रहे मुकदमे को हाई कोर्ट ने अधिकार क्षेत्र के भीतर माना।