
गजराज राव (फोटो सोर्स- पत्रिका न्यूज)
Gajraj Rao Interview: बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता गजराज राव ने 'राजस्थान पत्रिका' से खास बातचीत में अपने बचपन, दिल्ली के माहौल, थिएटर से जुड़ाव, अभिनय के संघर्ष, राजस्थानी सिनेमा की स्थिति और फिल्म इंडस्ट्री में नेपोटिज्म जैसे मुद्दों पर खुलकर बात की। उन्होंने बताया कि किस तरह पिता के संघर्ष ने उन्हें जीवन में निराश न होना सिखाया। गजराज ने ये भी कहा कि राजस्थान में प्रतिभाओं की कमी नहीं है, लेकिन यहां रंगमंच और सिनेमा को बढ़ावा देने के लिए मुश्किल प्रयासों की जरूरत है। ये रहे उनकी बातचीत के प्रमुख अंश
गजराज राव: दिल्ली में रहने के बावजूद हमारा परिवार वहां की चकाचौंध से दूर था। हम रेलवे कॉलोनी में रहते थे, जहां आसपास ज्यादातर निम्न-मध्यम वर्गीय परिवार थे। एक तरह से कहूं तो दिल्ली में रहते हुए भी हमारा परिवेश ग्रामीण ही था।
रेलवे कॉलोनी में पंजाब, हिमाचल, बंगाल, बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे अलग-अलग राज्यों के लोग रहते थे। इस वजह से अलग-अलग संस्कृतियों और भाषाओं से परिचय होता रहा। मेरे माता-पिता का भी गांव से गहरा जुड़ाव था। शादी-ब्याह हो या किसी के घर कोई दुखद खबर, परिवार वहां जरूर जाता था।
हमारा घर रेलवे स्टेशन के पास था, इसलिए हर महीने गांव से कोई न कोई रिश्तेदार या परिचित आ जाता था। उस समय मोबाइल फोन और आज की तरह निजी स्पेस का चलन नहीं था। कोई सीधे दरवाजा खटखटाकर आ जाता था। किसी को दिल्ली में परीक्षा देनी होती थी, किसी को इलाज करवाना होता था तो कोई घूमने के लिए आता था। हमारा घर एक तरह से गेस्ट हाउस बना रहता था।
इस माहौल ने मुझे अपनी भाषा और जड़ों से जोड़े रखा। वागड़ की जो स्थानीय भाषा है, उससे मेरा परिचय बना रहा। आज भी जब माता-पिता से बात करता हूं तो उसी भाषा में बात करता हूं। यह जुड़ाव आज तक बना हुआ है।
गजराज राव: मेरा परिचय थिएटर और रंगमंच से हुआ। परिवार की अपनी परिस्थितियां थीं। माता-पिता चाहते थे कि मैं जीवन में कुछ बड़ा करूं, लेकिन उन्हें यह नहीं पता था कि उन सपनों तक पहुंचने का रास्ता क्या है। इसलिए उनका सपना था कि मैं डॉक्टर बनूं, इंजीनियर बनूं या रेलवे में कोई बड़ा अधिकारी बनूं।
मेरे पिता की रेलवे में नौकरी थी और उन्हें सरकारी नौकरी से मिलने वाली सुविधाओं पर बहुत गर्व था। रेलवे के अस्पताल में इलाज, साल में मिलने वाले पास और नौकरी की सुरक्षा जैसी चीजें उनके लिए बहुत मायने रखती थीं। शायद मैं भी आगे चलकर रेलवे में ही कोई नौकरी करता, लेकिन इसी बीच रंगमंच से परिचय हो गया और मेरे सामने एक अलग दुनिया खुल गई।
मैंने अपने पिता को बहुत मेहनत करते देखा था। गर्मियों में वे ओवरटाइम करते थे और लगातार 12 से 16 घंटे तक काम करते थे। उन्हें मशीन की तरह काम करते देखकर कई बार मेरे मन में सवाल उठता था कि क्या जिंदगी सिर्फ इतनी ही है? साल में एक बार 15 दिन के लिए गांव जाना और फिर वापस आकर उसी तरह काम में जुट जाना। मुझे लगा कि मेरा जीवन मशीन की तरह नहीं चलना चाहिए। शायद इसी सोच ने मुझे रंगमंच की तरफ बढ़ने के लिए प्रेरित किया।
गजराज राव: मेरे पास अपने पिता का उदाहरण था। मेरे दादाजी का निधन उस समय हो गया था, जब मेरे पिता करीब 12 साल के थे। उन्होंने जीवन में बहुत कठिनाइयां देखी थीं, लेकिन मैंने उन्हें कभी निराश होते नहीं देखा। वे हर परिस्थिति से जूझते थे। उनके पास बहुत ज्यादा विकल्प नहीं थे, इसके बावजूद उन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी। मेरे लिए वही सबसे बड़ा बेंचमार्क था।
दूसरी बात यह थी कि मैं अपने परिवार पर आर्थिक बोझ नहीं बनना चाहता था। मुझे किताबें पढ़ने, फिल्म फेस्टिवल में जाने और सिनेमा देखने का शौक था। दिल्ली में रहते हुए ये सब करने के लिए पैसों की जरूरत होती थी। इसलिए मैंने टेलरिंग शॉप, गारमेंट एक्सपोर्ट और दूसरे छोटे-मोटे काम किए।
थिएटर के दौरान ही समझ में आने लगा था कि सिनेमा की दुनिया उतनी आसान नहीं है, जितनी बाहर से दिखाई देती है। उस समय मुंबई को बॉम्बे कहा जाता था। कई लोग वहां से आते और बताते कि वे महेश भट्ट के दफ्तर गए, फिरोज खान से मिले या अमिताभ बच्चन के साथ बैठे। उनकी बातें सुनकर लगता था कि वहां पहुंचना बहुत आसान होगा।
लेकिन कुछ लोग ऐसे भी थे, जो बताते थे कि मुंबई में संघर्ष कितना मुश्किल है। उस समय निजी टेलीविजन चैनल भी नहीं थे। सिनेमा में एक तरफ सुभाष घई जैसे बड़े फिल्मकारों की फिल्में थीं और दूसरी तरफ श्याम बेनेगल या कुंदन शाह जैसे निर्देशकों का सिनेमा था। थिएटर के कलाकारों को काम तो मिलता था, लेकिन उसमें बहुत ज्यादा पैसा नहीं होता था।
मैं एक-दो बार मुंबई गया। 'बैंडिट क्वीन' के दौरान भी वहां जाना हुआ। तब मुझे समझ आया कि सिर्फ ट्रेन से उतरने और किसी बड़े फिल्मकार के दफ्तर पहुंचने से काम नहीं मिलता। मुझे यह भी पता था कि मेरा परिवार मेरे सपनों को पूरा करने के लिए कई साल तक आर्थिक मदद नहीं कर सकता। इसलिए मैंने दिल्ली में रहकर काम करने का फैसला किया और विज्ञापन की दुनिया से जुड़ गया। प्रदीप सरकार के साथ भी काम किया।
मैं एक बात जरूर मानता हूं कि संघर्ष सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं होता। जब कोई इंसान अपने सपनों के लिए संघर्ष करता है तो उसके माता-पिता, परिवार, प्रेमिका, दोस्त और पत्नी भी उस संघर्ष का हिस्सा बन जाते हैं। संघर्ष सबका होता है।
गजराज राव: यह बहुत बड़ी विडंबना और त्रासदी है। राजस्थान में इतनी खूबसूरत जगहें हैं कि देशभर के फिल्मकार यहां शूटिंग करने आते हैं। चाहे उत्तर भारत के फिल्मकार हों या दक्षिण भारत के, राजस्थान उन्हें अपनी कहानियों के लिए एक अलग तरह की कल्पनाशीलता और दृश्य उपलब्ध कराता है।
विज्ञापन की दुनिया में भी राजस्थान से जुड़े लोगों ने बड़ा काम किया है। प्रसून पांडे और पीयूष पांडे जैसे बड़े नाम जयपुर से आते हैं। मुझे याद है कि प्रसून पांडे ने करीब 25-30 साल पहले फेविकोल का एक विज्ञापन बनाया था, जिसमें एक बस के ऊपर लोगों की भीड़ लटकी हुई दिखाई देती है। उस विज्ञापन की कल्पना और प्रस्तुति आज भी याद की जाती है।
जब इतने प्रतिभाशाली लोग राजस्थान से निकलकर देशभर में काम कर रहे हैं तो यहां अपना मजबूत सिनेमा क्यों नहीं विकसित हो पाया? मुझे लगता है कि इसके पीछे कहीं न कहीं नीतिगत स्तर पर इच्छाशक्ति और योजना की कमी रही होगी। पिछले 30-50 वर्षों में अगर इस दिशा में योजनाबद्ध तरीके से काम किया गया होता तो स्थिति अलग हो सकती थी।
राजस्थान में लेखक, निर्देशक और अभिनेता बड़ी संख्या में हैं। जरूरत है कि राज्य के नीति निर्माता इस तरफ ध्यान दें। जयपुर, जैसलमेर और जोधपुर में बाहर के लोग शूटिंग करने आते हैं तो यहां रंगमंच और सिनेमा को भी बढ़ावा क्यों नहीं दिया जा सकता?
मेरी बड़ी इच्छा है कि सांगवाड़ा में एक ड्रामा स्कूल बने। ऐसे बहुत सारे लोग हैं, जिनमें प्रतिभा है, लेकिन उन्हें आगे बढ़ने का मौका नहीं मिल पाता। अगर उन्हें अपने क्षेत्र में प्रशिक्षण और मंच मिले तो वे भी आगे आ सकते हैं।
गजराज राव: मेरे लिए अभिनय एक तरह की पेड वर्कशॉप है, जहां मुझे लगातार सीखने का मौका मिलता है। जब मैं किसी विज्ञापन में अभिनय करता हूं तो वहां दूसरे निर्देशकों और तकनीशियनों के काम करने का तरीका देखता हूं।
मैंने प्रसून पांडे के विज्ञापनों में काफी काम किया है। उनके सेट पर काम करने का तरीका, तकनीशियनों से बातचीत, कलाकारों को संभालना और पूरी टीम को मैनेज करना अपने आप में सीखने वाली चीजें हैं। मेरे लिए उनके साथ काम करना सौभाग्य की बात रही है।
जब मैं खुद किसी विज्ञापन का निर्देशन करता हूं तो अभिनय के दौरान मिली इन जानकारियों को अपने काम में इस्तेमाल करने की कोशिश करता हूं। इसलिए मुझे दोनों कामों में मजा आता है। एक तरफ अभिनय से सीखता हूं और दूसरी तरफ निर्देशन में उस सीख को लागू करता हूं।
गजराज राव: उस फिल्म के किरदार और उसकी कहानी से मेरा एक अलग तरह का जुड़ाव था। जितेंद्र का किरदार रेलवे से जुड़ा हुआ था और मैंने अपनी जिंदगी रेलवे क्वार्टर में बिताई थी। इसलिए उस परिवेश और वहां के लोगों को मैं पहले से जानता था। ऐसे कई किरदार मैंने अपने आसपास देखे थे।
कुछ फिल्में ऐसी होती हैं, जिनका जादुई समीकरण सालों में बनता है। 'शोले', 'जाने भी दो यारों' और 'दिल चाहता है' जैसी फिल्मों की एक अलग जगह है। मेरे हिसाब से 'बधाई हो' भी उसी श्रेणी की फिल्म है। उसकी लेखन शैली अच्छी थी, अभिनय को सराहा गया और निर्देशन से लेकर संगीत तक हर पहलू को दर्शकों ने पसंद किया।
उस फिल्म ने मेरी जिंदगी बदल दी। आप सोचिए, अगर 'बधाई हो' नहीं होती तो शायद मैं आज राजस्थान पत्रिका के दफ्तर में बैठकर यह इंटरव्यू नहीं दे रहा होता।
गजराज राव: नहीं, मेरा मानना है कि यह अलग-अलग दौर की बात है। मैं इसे उत्तर और दक्षिण के सिनेमा के नजरिए से नहीं देखता। एक समय ऐसा था, जब हिंदी सिनेमा की कई बड़ी फिल्मों का दक्षिण भारतीय सिनेमा में रीमेक बनाया जाता था। 'दीवार' से लेकर 'शोले' तक कई फिल्मों का वहां अलग रूप देखने को मिला।
उस समय एक समानांतर बिजनेस मॉडल भी था। दक्षिण के फिल्म निर्माता हिंदी फिल्मों के कलाकारों को लेकर फिल्में बनाते थे। जितेंद्र जैसे कलाकार साल के कई महीने वहां काम करते थे। इसलिए फिल्म इंडस्ट्री में समय और परिस्थितियों के हिसाब से चीजें बदलती रहती हैं।
गजराज राव: हां, यह अनुचित है। ऐसा नहीं होना चाहिए। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि कला और सिनेमा के ऊपर इतनी पाबंदियां लगाई जाएं। मुझे उम्मीद है कि आने वाले समय में इस स्थिति में बदलाव आएगा और फिल्मकारों को अपनी बात कहने की ज्यादा स्वतंत्रता मिलेगी।
गजराज राव: मेरे लिए सफलता की परिभाषा बहुत अलग है। जैसे अभी मैं इस कमरे में बैठा हूं और यहां छह लोग मौजूद हैं। जब मैं उनकी आंखों में अपने लिए स्नेह देखता हूं तो वह मेरे लिए सफलता है। ऐसा नहीं लगना चाहिए कि कोई मजबूरी में आपके साथ बैठा है या सोच रहा है कि यह कौन है और इसे यहां क्यों बुला लिया।
कुछ समय पहले मैं जयपुर के बापू बाजार गया था। वहां एक दुकान से मैंने जूते खरीदे। मैंने मास्क लगाया हुआ था, ताकि लोग मुझे पहचानें नहीं। मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं था कि मैं किसी के बीच जाकर बताऊं कि मैं कलाकार हूं और लोग मुझे पहचानें। लेकिन वहां दुकानदार ने मुझे पहचान लिया। मैं दोबारा भी वहां गया। पिछली बार उन्होंने कहा कि आपसे पैसे नहीं लेंगे।
ऐसा ही अनुभव रेस्टोरेंट, फ्लाइट और दूसरी जगहों पर भी होता है। अलग-अलग उम्र के लोग मिलते हैं। कोई 10-12 साल का बच्चा होता है, जिसे मेरे काम की लाइनें याद होती हैं, तो कोई 70-80 या 90 साल का व्यक्ति होता है। महिलाएं, पुरुष और युवा, सभी का अपना स्नेह मिलता है।
यह देखकर मन को एक तरह की ठंडक मिलती है कि शायद मैंने कुछ ठीक काम किया है, जिसकी वजह से लोग इतना प्यार दे रहे हैं। मेरे लिए यही सफलता है।
लेकिन यह सफलता हमेशा के लिए नहीं होती। ऐसा नहीं है कि एक बार कोई उपलब्धि मिल गई तो वह जिंदगीभर आपके पास रहेगी। मुझे रोज मेहनत करनी है और ऐसा कोई काम नहीं करना है, जिससे लोगों का मेरे ऊपर बना भरोसा टूट जाए।
अगर मैं छह महीने या दो साल तक काम नहीं करता हूं तो लोगों के मन में बनी मेरी छवि भी धूमिल हो सकती है। इसलिए सफलता को बनाए रखने के लिए लगातार काम करना पड़ता है। मेरे लिए लोगों का स्नेह और उनका भरोसा ही सबसे बड़ी सफलता है।
Updated on:
5 Nov 2026, 6:43 PM IST
Published on:
5 Nov 2026, 6:43 PM IST
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