
Navratri unique stories: 80 सालों से नहीं हुआ मां काली की प्रतिमा का विसर्जन (फोटो सोर्स- Patrika)
Datia Maa Kali idol Story: नवरात्र में देशभर में मां दुर्गा और मां काली की प्रतिमाएं स्थापित की जाती है। दशमी के बाद अधिकांश प्रतिमाओं का विसर्जन कर दिया जाता है, लेकिन दतिया के दारूगर की पुलिया पर मां काली का एक ऐसा दरबार है, जहां करीब 80 साल पुरानी मिट्टी की प्रतिमा आज भी विराजमान है। यहां प्रतिमा विसर्जित करने के बजाय नवरात्र के अंतिम दिन तालाब के पानी से मां का मुख धुलाने की परंपरा निभाई जाती है।
आस्था, लोकमान्यता और पारिवारिक विरासत से जुड़ी यह परंपरा श्रद्धालुओं को सतत रूप से आकर्षित करती आ रही है। 82 वर्षीय विद्याराम साह बताते हैं कि जब से उन्होंने होश संभाला है, तब से यहां मां काली का दरबार सजा देखते आ रहे है। उनके मुताबिक, कुरियाने मोहल्ले के परिवारों ने मिलकर यहां प्रतिमा स्थापना की परंपरा शुरू की थी। स्थानीय लोगों के आर्थिक सहयोग से यहां टीनशेड बनवाया गया, ताकि मौसम की मार से दरबार सुरक्षित रह सके।
दिलासाराम दांगी के अनुसार कुरियाने क्षेत्र में पर्वत कोरी नाम के एक भक्त हुआ करते थे। वे नियमित रूप से सुखदेव बाबा के पहाड़ पर जाकर साधना करते थे। मान्यता है कि साधना के दौरान मां काली ने उन्हें कन्या के रूप में दर्शन दिए। इसके बाद उन्होंने दारूगर की पुलिया पर मां काली की प्रतिमा स्थापित करने का संकल्प लिया। स्थानीय लोगों के अनुसार, तभी से यहां प्रतिमा स्थापना और विशेष पूजा की परंपरा चली आ रही है।
विसर्जन नहीं, तालाब के पानी से मुख धुलाने की परंपरा इस दरबार की सबसे खास परंपरा प्रतिमा विसर्जन से जुड़ी है। नवरात्र के अंतिम दिन जवारे विसर्जन यात्रा के दौरान मां काली की प्रतिमा को गाजे-बाजे के साथ स्थानीय तालाब तक ले जाया जाता है। वहां तालाब के पानी से प्रतीकात्मक रूप से मां का मुख धुलाया जाता है। इसके बाद प्रतिमा को स्वच्छ वस्त्र और लाल कपड़े से ढककर वापस पंडाल में लाया जाता है। अगले साल फिर इसी प्रतिमा का श्रृंगार कर पूजा-अर्चना की जाती है।
यहां मां काली की प्रतिमा पूरी तरह मिट्टी से बनी है। इसके एक मुख, चार भुजाएं और दो चरण हैं। मां के गले में 13 नरमुंडों की माला भी मिट्टी से बनाई गई है। नवरात्र के दौरान विशेष विधि-विधान और मंत्रोच्चार के साथ पूजा की जाती है। श्रद्धालु दर्शन और पूजन के लिए पहुंचते हैं।
मां काली की प्रतिमा की देखभाल और जीर्णोद्धार की जिम्मेदारी बुलकिया परिवार की तीन पीढियां निभा रही हैं। बताया जाता है कि प्रतिमा का निर्माण सबसे पहले मूर्तिकार पोतूराम बुलकिया ने किया था। समय के साथ प्रतिमा का चेहरा क्षतिग्रस्त हुआ तो उनके बेटे लल्ला बुलकिया ने उसे दोबारा तैयार किया। अब परिवार की तीसरी पीढ़ी के दयाराम बुलकिया हर साल नवरात्र रो पहले प्रतिमा की मरम्मत, रंगाई और पुताई करते हैं। इस तरह करीब आठ दशक पुरानी आस्था और परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ रही है।
Updated on:
14 Oct 2026 01:26 pm
Published on:
14 Oct 2026 01:26 pm
बड़ी खबरें
View Allदतिया
मध्य प्रदेश न्यूज़
ट्रेंडिंग
Copyright © 2026 Patrika Group. All Rights Reserved.
