
नाना पाटेकर का एमपी दौरा (Photo Source - Patrika)
Nana Patekar Death: फिल्मी पर्दे पर दमदार अभिनय और संवाद अदायगी से अलग पहचान बनाने वाले नाना पाटेकर का एक चेहरा ऐसा भी था, जो कैमरे की चकाचौंध से दूर आम आदमी के दर्द को महसूस करता था। गुरुवार को उनके निधन की खबर ने देशभर में उनके प्रशंसकों को शोक में डुबो दिया, लेकिन नर्मदा घाटी के उन लोगों के लिए नाना पाटेकर सिर्फ अभिनेता नहीं थे। करीब तीन दशक पहले जब वे सरदार सरोवर डूब प्रभावितों के बीच पहुंचे थे, तब ग्रामीणों के बीच बैठकर उनकी पीड़ा सुनी थी।
उनकी सादगी ने लोगों को इस कदर प्रभावित किया था कि वर्षों बाद भी लोग उस मुलाकात को याद करते हैं। साल 1996 में नाना पाटेकर नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेत्री मेधा पाटकर के साथ छोटी कसरावद (बड़वानी) पहुंचे थे। मनावर और कुक्षी तहसील क्षेत्र के कई गांवों के लोग उनसे मिले। साततलाई, गांगली, चिखल्दा, नर्मदा नगर और निसरपुरके ग्रामीणों ने उन्हें बताया कि किस तरह डूब के कारण उनकी खेती, घर और जीवन की पूरी व्यवस्था संकट में आ गई है।
नाना ने किसी बड़े सितारे की तरह औपचारिक मुलाकात नहीं की। वे ग्रामीणों के बीच अपनेपन से बैठे और बात की। साततलाई के सूरज पूछा था कि यहां कितने परिवार डूब से प्रभावित हैं। ग्रामीण जब अपने घर और खेत छिनने की पीड़ा बताई तो नाना भावुक हो गए थे।
नाना पाटेकर की यही सादगी उस दौर में नर्मदा पट्टे के लोगों के दिल में उतर गई थी। वे अभिनेता होकर भी ग्रामीणों के बीच अपने व्यक्ति की तरह मिले थे। वे किसानों, मजदूरों और गरीबों की परेशानियों को लेकर लगातार संवेदनशील रहे। नर्मदा के डूब प्रभावितों के बीच करीब 30 साल पहले बिताया समय आज उनकी स्मृति का ऐसा हिस्सा बन गया है, जिसे लोग नहीं भूल पाएंगे।
जानकारी के लिए बता दें कि बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का 8 अक्टूबर को निधन हो गया। वह 75 साल के थे। मेडिकल टीम जब उनके घर पहुंची तो एक्टर बेहोश मिले। उन्हें अस्पताल लाया गया, जहां तमाम कोशिशों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। मणिपाल अस्पताल में डॉक्टरों ने सुबह 5:20 बजे उन्हें मृत घोषित कर दिया। उन्हें बचाने के लिए करीब 45 मिनट तक लगातार सीपीआर दिया गया, लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली।
Updated on:
09 Oct 2026 08:53 am
Published on:
09 Oct 2026 08:53 am
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