
अफसरों के भ्रष्टाचार पर कार्रवाई की मंजूरी का मामला ठंडे बस्ते में (फोटो-एआई)
जयपुर: कॉटेज-विला खरीद मामले में अतिरिक्त मुख्य सचिव शिखर अग्रवाल और उनकी पत्नी अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक डॉ. प्रशाखा माथुर के खिलाफ मामला भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) पहुंचने के बाद बड़े अफसरों की 'काली' कमाई का मामला फिर चर्चा में है। चौंकाने वाली बात यह है कि जब आईएएस, आईपीएस और आईएफएस सहित तमाम अधिकारियों की संपत्ति का ब्योरा हर कोई देख सकता है, तो मनी लॉन्ड्रिंग, भ्रष्टाचार और राजस्व चोरी रोकने के लिए बनी एजेंसियों की नजर इन पर क्यों नहीं जाती?
यह सवाल केंद्रीय एजेंसियों प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई), एसीबी और राजस्व आसूचना एवं आर्थिक अपराध निदेशालय (डीआरआईई) की भूमिका से भी जुड़ा है। वहीं, भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो की ओर से जारी 30 सितंबर तक के आंकड़ों के अनुसार, 783 मामले ऐसे हैं, जिनमें जांच प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए अभियोजन स्वीकृति का इंतजार है। अभियोजन स्वीकृति मिलने पर ही जांच आगे बढ़ सकती है।
भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम में जांच से पहले अभियोजन स्वीकृति की अनिवार्यता को चुनौती देने वाली याचिका पर गत जनवरी में सुप्रीम कोर्ट की पीठ के दोनों न्यायाधीशों की अलग-अलग राय सामने आई, जिसके बाद से मुद्दा ठंडे बस्ते में है। कानून में प्रावधान है कि आईएएस, आईपीएस और आईएफएस से लेकर हर अधिकारी तथा मंत्रियों की अचल संपत्ति का ब्योरा सालाना सार्वजनिक किया जाए, लेकिन जांच एजेंसियों ने इस ब्योरे को कभी खंगाला ही नहीं। अब कहा जा रहा है कि केवल शिकायत आने पर ही संपत्ति रिटर्न को देखा जाता है। वहीं, कुछ वर्ष पहले तक मंत्रियों का वार्षिक संपत्ति विवरण कोई भी देख सकता था। पिछले कुछ वर्षों से ऐसा नहीं होने के कारण अब जनता इसे नहीं देख पाती।
केंद्र सरकार ने 2018 में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम में धारा 17ए जोड़कर लोकसेवकों के खिलाफ जांच के लिए सरकारी मंजूरी अनिवार्य कर दी। इसे सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। दोनों न्यायाधीशों ने सुनवाई कर 6 अगस्त 2025 को फैसला सुरक्षित रख लिया, जो जनवरी 2026 में सुनाया गया। इसमें कहा गया कि सभी पहलुओं पर सुनवाई हो, इसलिए विस्तृत सुनवाई के लिए सीजेआई उपयुक्त पीठ गठित करें।
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17ए के तहत जांच शुरू करने से पहले स्वीकृति की शर्त कानून की भावना के विपरीत है। यह प्रावधान ईमानदार लोकसेवकों की रक्षा करने के बजाय भ्रष्ट लोकसेवकों को बचाता है। जांच को शुरुआती स्तर पर ही रोक देता है।
भ्रष्टाचार संविधान की भावना और सुशासन का शत्रु है। इसका हर मामला सरकार और संस्थानों पर नागरिकों का भरोसा तोड़ता है, समाज में असमानता बढ़ाता है और वंचित वर्ग को मिलने वाली सेवाओं को प्रभावित करता है।
धारा 17ए संवैधानिक है, लेकिन जांच की मंजूरी का अधिकार लोकपाल या लोकायुक्त को सौंपा जाना चाहिए। इसे खत्म करना 'बच्चे को नहाने के पानी से बाहर निकाल फेंकने' जैसा होगा। यदि ईमानदार लोकसेवकों को फालतू की जांच से नहीं बचाया गया, तो 'नीतिगत विकृति' जैसी स्थिति बन जाएगी।
उनका सवाल है: 'धारा 17ए को खत्म कर दिया तो लोकपाल के जरिए आने वाली शिकायतों की स्क्रीनिंग होगी और पुलिस के जरिए आने वाली शिकायतों की स्क्रीनिंग नहीं होगी। इससे स्ट्रक्चरल असंतुलन पैदा हो जाएगा।'
राजस्थान सरकार ने 2017 में अध्यादेश के माध्यम से यह प्रावधान कर दिया था कि अधिकारियों के अपने पदीय दायित्व से संबंधित कार्यों के मामले में न्यायालय सरकार की अनुमति के बिना जांच का आदेश नहीं दे सकेगा। सरकार की अनुमति मिलने से पहले मीडिया ऐसे अधिकारियों के बारे में कुछ भी प्रकाशित नहीं कर सकेगा। राजस्थान पत्रिका ने इस मुद्दे को लेकर 'जब तक काला, तब तक ताला' अभियान चलाया, जिसके बाद राज्य सरकार को इस अध्यादेश को कानून का दर्जा देने के लिए विधानसभा में पेश विधेयक वापस लेना पड़ा।
लोकपाल-लोकायुक्त संस्था में भी निर्णय वहां नियुक्त व्यक्ति पर निर्भर करता है। राजस्थान में अभियोजन स्वीकृति का अधिकार लोकायुक्त को देने का प्रस्ताव राज्य सरकार को दिया हुआ है। यह अधिकार दिया जाए, लेकिन लोकपाल-लोकायुक्त ऐसे व्यक्ति को ही बनाया जाए, जो एक्टिव हो।
-एस.एस. कोठारी, पूर्व लोकायुक्त, राजस्थान
Updated on:
2 Nov 2026, 8:10 AM IST
Published on:
2 Nov 2026, 8:10 AM IST
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