
Sachin Pilot, CEC Gyanesh Kumar, Modi-Shah -- File Pic
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सचिन पायलट ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार और देश की केंद्रीय सत्ता पर बेहद तीखे और गंभीर हमले किए हैं। जयपुर में मीडिया से मुखातिब होते हुए पायलट ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता अब खतरे में पड़ चुकी है और देश के लोकतांत्रिक ढांचे के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि एक तरफ जहां देश की आबादी लगातार बढ़ रही है और हर चुनाव के बाद मतदाताओं की संख्या में स्वाभाविक बढ़ोतरी दर्ज होनी चाहिए, वहीं इसके विपरीत देश भर में सुनियोजित तरीके से मतदाताओं के नाम काटे जा रहे हैं।
पायलट ने दावा किया कि इस देश के इतिहास में ऐसा पहली बार हो रहा है जब टारगेटेड तरीके से लोगों के वोट काटे जा रहे हैं। उन्होंने कड़े शब्दों में कहा कि इस सरकार के कार्यकाल में पहले 'नोटबंदी' जैसी मार झेली गई और अब देश के नागरिकों पर 'वोटबंदी' थोपी जा रही है। जनता से मतदान करने का उनका यह संवैधानिक अधिकार छीना जाना लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना और पराकाष्ठा है, जिसे किसी भी कीमत पर सहन नहीं किया जा सकता।
सचिन पायलट ने चुनाव आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि पूरी चुनाव प्रक्रिया को सेंट्रलाइज्ड कर दिया गया है। उन्होंने विस्तार से आरोप लगाते हुए कहा कि ज्ञानेश कुमार ने बाकी दोनों चुनाव आयुक्तों को किनारे कर दिया और अपने स्तर पर तमाम प्रक्रियाएं संचालित कीं। नियमों के मुताबिक किसी भी मतदाता का नाम जोड़ने या काटने की असली शक्ति 'इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर' (ERO) यानी एसडीएम स्तर के अधिकारी के पास होती है।
लेकिन आरोप है कि ईआरओ की तमाम शक्तियों को अपने पास केंद्रित करके दिल्ली में बैठे अधिकारियों द्वारा निजी दफ्तरों से सीधे नाम काटे और जोड़े जा रहे हैं। पायलट के अनुसार, हरियाणा, बिहार और बंगाल समेत विभिन्न राज्यों के आंकड़ों को उठाकर देख लीजिए, वहां जानबूझकर चुनिंदा और लक्षित वोट काटे गए हैं। यह स्थिति न केवल चुनावी प्रक्रिया को संदेहास्पद बनाती है, बल्कि पूरी व्यवस्था की पारदर्शिता पर भी एक बड़ा धब्बा लगाती है।
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान सचिन पायलट ने इस बात पर जोर दिया कि जो संस्थाएं इस देश के लोकतंत्र की संरक्षक और रक्षक होने की भूमिका में आनी चाहिए थीं, वे आज सत्ताधारी दल की मदद करती हुई प्रतीत हो रही हैं। जब चुनाव प्रक्रिया, मतदान, वोटों की गिनती और आचार संहिता के उल्लंघन जैसे मामलों में पक्षपात नजर आने लगे, तो जनता का उस संवैधानिक संस्था से विश्वास उठ जाता है।
उन्होंने कहा कि आज देश भर में सिर्फ इंडिया गठबंधन या कांग्रेस पार्टी की बात नहीं है, बल्कि देश का युवा और हर वर्ग का नागरिक इस पूरी चुनावी कार्यप्रणाली को लेकर गहरे संदेह में है।
सचिन पायलट ने कहा कि आचार संहिता लागू होने के बावजूद एनडीए के घटक दलों के खातों में धन आवंटन की अनुमति जैसी बातें सीधे तौर पर निर्वाचन आयोग की कार्यशैली पर सवालिया निशान लगाती हैं। यही कारण है कि आज देश भर में इन मुद्दों को लेकर आंदोलन हो रहे हैं और यह मांग उठ रही है कि दोषी पदाधिकारियों को बर्खास्त किया जाए।
अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए सचिन पायलट ने यह भी स्पष्ट किया कि इन तमाम व्यवस्थाओं और फैसलों को केवल चुनाव आयोग तक सीमित नहीं माना जा सकता। उन्होंने सीधे तौर पर देश के प्रधानमंत्री और गृह मंत्री का जिक्र करते हुए कहा कि इन संस्थाओं को वैचारिक और राजनीतिक रूप से जो पोषण और ताकत मिल रही है, उसका सिरा शीर्ष स्तर तक जुड़ा हुआ है। जब देश के कर्णधार ही लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने वाली ताकतों को संरक्षण देंगे, तो व्यवस्था का संतुलन बिगड़ना स्वाभाविक है। कांग्रेस पार्टी और देश के तमाम जागरूक नागरिक इस तानाशाही रवैये के खिलाफ अपनी आवाज पूरी मजबूती से उठाते रहेंगे।
इस पूरे विवाद को समझने के लिए सिक्के के दोनों पहलुओं यानी कांग्रेस (विपक्ष) की दलीलों और चुनाव आयोग (ECI) के स्पष्टीकरण को देखना जरूरी है:
आंतरिक मतभेद: मीडिया रिपोर्ट्स में यह सामने आया है कि खुद चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में SIR प्रक्रिया, फॉर्म 6 में संशोधनों और नाम हटाने/जोड़ने से जुड़े करीब 14 फैसलों पर अपनी लिखित आपत्तियां दर्ज कराई थीं।
मामला सुप्रीम कोर्ट में: इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) भी दायर की जा चुकी है, जिसमें 13 करोड़ नाम हटाने की जांच के लिए SIT (विशेष जांच दल) गठित करने और CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है।
विपक्ष के इन तीखे हमलों पर Election Commission of India (ECI) ने एक विस्तृत स्पष्टीकरण और FAQ जारी कर इन आरोपों को पूरी तरह खारिज और भ्रामक बताया है:
13 करोड़ का असली सच: चुनाव आयोग का कहना है कि 13.3 करोड़ नाम पूरी तरह 'काटे' या 'डिलीट' नहीं किए गए हैं। यह आंकड़ा केवल ड्राफ्ट स्टेज (शुरुआती सूची) का है, जिसमें उन लोगों को चिह्नित किया गया है जो या तो अपने पते से अनुपस्थित हैं, कहीं और शिफ्ट (Shifted) हो गए हैं, मृत (Dead) हो चुके हैं या जिनके नाम दो जगह दर्ज हैं।
सुधार का मौका: आयोग के अनुसार, हटाए गए कुल नामों में से लगभग 71.5% लोग शिफ्टेड या अनुपस्थित श्रेणी के हैं। ऐसे सभी प्रभावित लोग 'फॉर्म-6' भरकर दोबारा मतदाता सूची में अपना नाम आसानी से जुड़वा सकते हैं। इसके लिए आयोग ने सभी राज्यों के निर्वाचन अधिकारियों को विशेष अभियान चलाने के निर्देश भी जारी किए हैं।
तकनीकी तौर पर, 13 करोड़ लोगों की नागरिकता या वोटिंग अधिकार स्थायी रूप से नहीं छीने गए हैं, जैसा कि विपक्ष द्वारा प्रस्तुत किया जा रहा है। यह वोटर लिस्ट को साफ और पारदर्शी बनाने की एक प्रशासनिक प्रक्रिया है। हालांकि, सचिन पायलट और विपक्ष के आरोपों में इस मायने में दम है कि चुनाव आयोग के भीतर आयुक्तों के आपसी मतभेद, फॉर्म-6 में अचानक किए गए बदलाव, और ग्राउंड स्तर पर आम जनता को नाम कटने के बाद आ रही व्यावहारिक परेशानियां निश्चित रूप से व्यवस्था की पारदर्शिता और कार्यप्रणाली पर बड़े गंभीर सवाल खड़े करती हैं।
Updated on:
04 Oct 2026 02:29 pm
Published on:
04 Oct 2026 02:23 pm
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