
Rajasthan Panchayat Election (Patrika File Photo)
ए नरपत जे चौधरी/ओसियां @ पत्रिका। आज पंचायत राज चुनावों में गांव-गांव प्रचार, जनसंपर्क, चुनावी सभाओं और मतदाताओं को साधने का दौर दिखाई देता है। पंचायत समिति सदस्य और जिला परिषद सदस्य बनने के लिए प्रत्याशी सीधे जनता के बीच पहुंचते हैं। लेकिन करीब तीन दशक पहले तक पंचायत राज चुनावों की तस्वीर इससे काफी अलग थी। उस दौर में पंचायत समिति के प्रधान और जिला प्रमुख के चुनाव में सरपंचों और पंचायत प्रतिनिधियों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती थी।
चुनावी गणित में जनता के साथ-साथ निर्वाचित प्रतिनिधियों के समर्थन का भी खास महत्व था। राजस्थान में पंचायती राज व्यवस्था की शुरुआत 2 अक्टूबर 1959 को नागौर से हुई थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस व्यवस्था का उद्घाटन किया था। इसके साथ ही गांवों में सत्ता के विकेंद्रीकरण और स्थानीय स्तर पर जनप्रतिनिधियों के माध्यम से विकास की अवधारणा को नई दिशा मिली। हालांकि, समय के साथ इस व्यवस्था में कई बदलाव हुए और वर्ष 1995 को पंचायत राज चुनावों के इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है।
पुरानी व्यवस्था में ग्राम पंचायत के पंच और सरपंच जनता के सीधे मतदान से चुने जाते थे। वहीं, पंचायत समिति और जिला परिषद के गठन तथा उनके प्रमुखों के चुनाव की प्रक्रिया मौजूदा व्यवस्था से अलग थी।
पंचायत समिति में ग्राम पंचायतों के सरपंच पदेन सदस्य के रूप में शामिल होते थे। प्रधान के चुनाव में पंचायत समिति के सदस्यों के साथ ग्राम पंचायतों के प्रतिनिधियों की भी भूमिका रहती थी।
इसी तरह जिला स्तर पर भी पंचायत समितियों के प्रधान जिला परिषद की व्यवस्था से जुड़े होते थे। ऐसे में प्रधान और जिला प्रमुख के चुनाव में निर्वाचित प्रतिनिधियों के बीच समर्थन जुटाना महत्वपूर्ण होता था। राजनीतिक दलों और स्थानीय नेताओं के लिए इन प्रतिनिधियों का समर्थन सत्ता तक पहुंचने का रास्ता बन सकता था।
राजस्थान में पंचायती राज संस्थाओं के चुनावों का इतिहास भी कम रोचक नहीं है। राज्य निर्वाचन आयोग के अनुसार, पहला आम चुनाव 1960 में हुआ था। इसके बाद 1965, 1978, 1981 और 1988 में चुनाव हुए। यानी 1965 के बाद अगले आम चुनाव 1978 में हुए और इस बीच करीब 13 साल का अंतर रहा।
उस समय पंचायत चुनाव कराने की जिम्मेदारी राज्य निर्वाचन आयोग के बजाय सरकारी विभागों के पास थी। वर्ष 1994 में राज्य निर्वाचन आयोग के गठन के बाद पंचायत राज संस्थाओं के चुनाव कराने की जिम्मेदारी इस संवैधानिक संस्था को मिली। इसके बाद 1995 में नए संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप चुनाव कराए गए।
वर्ष 1992 में संसद ने 73वां संविधान संशोधन पारित किया, जो 24 अप्रैल 1993 से प्रभावी हुआ। इसके बाद राजस्थान में पंचायती राज अधिनियम, 1994 के माध्यम से नई संवैधानिक व्यवस्था लागू करने का रास्ता तैयार हुआ। वर्ष 1995 में पहली बार नए प्रावधानों के अनुरूप पंचायत राज संस्थाओं के चुनाव हुए।
इस बदलाव के तहत पंचायतों को संवैधानिक दर्जा मिला और नियमित चुनाव की व्यवस्था मजबूत हुई। पंचायतों का कार्यकाल पांच वर्ष निर्धारित किया गया। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिलाओं के लिए प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के प्रावधान किए गए। पंचायत समिति और जिला परिषद के निर्वाचित सदस्यों के चयन की प्रक्रिया भी अधिक स्पष्ट हुई।
नई व्यवस्था में मतदाता सीधे अपने क्षेत्र के पंचायत समिति सदस्य और जिला परिषद सदस्य का चुनाव करते हैं। इसके बाद निर्वाचित सदस्य अपने बीच से प्रधान और जिला प्रमुख का चुनाव करते हैं।
इस तरह चुनावी मुकाबला अब केवल सरपंचों और स्थानीय प्रतिनिधियों के समर्थन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पंचायत समिति और जिला परिषद क्षेत्रों के मतदाताओं का जनादेश भी निर्णायक बनता है।
पंचायती राज व्यवस्था में हुए इन बदलावों ने ग्रामीण राजनीति की दिशा और चुनावी रणनीतियों को काफी हद तक बदल दिया। पहले जहां प्रतिनिधियों के बीच समर्थन जुटाना अहम था, वहीं अब राजनीतिक दलों और प्रत्याशियों को सीधे जनता के बीच अपनी पकड़ साबित करनी पड़ती है।
राजस्थान में पंचायती राज की शुरुआत से लेकर 1995 के चुनाव तक का सफर बताता है कि ग्रामीण लोकतंत्र समय के साथ किस तरह विकसित हुआ। आज गांव की सरकार चुनने में मतदाताओं की सीधी भागीदारी और संवैधानिक व्यवस्था की अहम भूमिका है। अब हर एक मतदाता की भूमिका होती हैं। पहले ऐसा नहीं था।
Updated on:
14 Oct 2026 04:38 pm
Published on:
14 Oct 2026 04:34 pm
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