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कांशीराम का ‘बहुजन’ फॉर्मूला कितना बदला? जानिए आज कहां खड़ी है दलित राजनीति

Kanshiram Punyatithi 2026: कांशीराम की 20वीं पुण्यतिथि पर जानिए कैसे बदला बसपा का 'बहुजन' फॉर्मूला? 2007 में सत्ता की 'मास्टर चाबी' पाने वाली बसपा के सामने 2027 यूपी चुनाव में क्या हैं सबसे बड़ी चुनौतियां।
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Kanshi Rm Ji 20th punyatithi

कांशीराम पुण्यतिथि पर मायावती ने दी श्रद्धांजलि फोटो @Mayawati

Mayawati Bahujan Samaj Party: बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक मान्यवर कांशीराम की 20वीं पुण्यतिथि (9 अक्टूबर 2026) पर एक बार फिर उनके ‘बहुजन’ फॉर्मूले की प्रासंगिकता पर चर्चा छिड़ गई है। कांशीराम ने दलित, आदिवासी, पिछड़े और अन्य कमजोर वर्गों को ‘बहुजन’ की एक बड़ी राजनीतिक पहचान देकर सत्ता की चाबी दिलाने का सपना देखा था। आज, उनकी पुण्यतिथि पर मायावती लखनऊ में श्रद्धांजलि अर्पित कर रही हैं और 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव का बिगुल फूंक रही हैं, लेकिन सवाल यही है कि कांशीराम का वह फॉर्मूला कहां पहुंचा और दलित राजनीति की मौजूदा तस्वीर क्या है?

कांशीराम का मूल फॉर्मूला: ‘बहुजन’ की एकजुटता

कांशीराम का फॉर्मूला साफ था-छोटी-छोटी वंचित जातियों की पहचान को मिटाए बिना उन्हें एक बड़े राजनीतिक मंच पर लाना। बामसेफ (BAMCEF) से लेकर डीएस-4 और फिर 1984 में बसपा की स्थापना तक उनका नारा रहा-“जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी।” उन्होंने बाबासाहेब अंबेडकर के आत्मसम्मान के आंदोलन को आगे बढ़ाते हुए दलितों को सिर्फ वोट बैंक नहीं, बल्कि शासक वर्ग बनाने की बात कही।

2007 में इस फॉर्मूले का चरम रूप दिखा। मायावती के नेतृत्व में बसपा ने यूपी में 30.43 प्रतिशत वोट और 206 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। दलित (खासकर जाटव), मुस्लिम और ब्राह्मण का गठबंधन सफल रहा। कांशीराम के सपने को साकार करते हुए बहुजन समाज को सत्ता की ‘मास्टर चाबी’ मिली। मायावती ने आज भी पुण्यतिथि पर दोहराया कि कांशीराम का मिशन शोषित को शासक बनाना था और बसपा ने यूपी में चार बार सरकार बनाकर इसे जमीन पर उतारा।

फॉर्मूले में आया बदलाव: सरवजन से सिमटता आधार

कांशीराम के निधन (2006) के बाद मायावती ने ‘बहुजन’ को ‘सरवजन’ में बदलने की कोशिश की। 2007 की सफलता के बाद पार्टी ने ऊपरी जातियों और अन्य वर्गों तक पहुंच बढ़ाई। लेकिन 2012 के बाद गिरावट शुरू हो गई। 2012 में 25.91 प्रतिशत वोट और 80 सीटें, 2017 में 22 प्रतिशत के आसपास और 19 सीटें, 2022 में महज 12.88 प्रतिशत वोट और एक सीट। 2024 लोकसभा चुनाव में यूपी में वोट शेयर 9.39 प्रतिशत रह गया और एक भी सीट नहीं मिली।
राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि बहुजन फॉर्मूला जातियों के कुनबों में बिखर गया। कई पिछड़े नेता (जैसे सोनलाल पटेल, ओम प्रकाश राजभर, संजय निषाद, स्वामी प्रसाद मौर्य) पार्टी छोड़कर अपनी जातीय पार्टियां बना बैठे। भाजपा ने छोटे जातियों को हिंदुत्व और सत्ता की हिस्सेदारी का विकल्प दिया। नतीजा—बहुजन की व्यापक पहचान सिमटकर मुख्य रूप से जाटव आधार रह गई।

आज दलित राजनीति कहां खड़ी है?

यूपी में दलित आबादी करीब 21 प्रतिशत है। इनमें जाटव सबसे बड़े समूह हैं (लगभग आधा)। कभी 80-90 प्रतिशत जाटव बसपा के साथ खड़े होते थे, लेकिन 2022 में यह आंकड़ा 65 प्रतिशत के आसपास आ गया। गैर-जाटव दलित (पासी, खटीक, वाल्मीकि आदि) का बड़ा हिस्सा भाजपा की तरफ शिफ्ट हो चुका है।

आज दलित वोट चार दिशाओं में बंट रहा है:

बसपा: कोर जाटव आधार अभी भी बचा है, लेकिन कुल वोट 10 प्रतिशत से नीचे।
भाजपा: गैर-जाटव दलितों और समरसता अभियान के जरिए मजबूत पकड़।
समाजवादी पार्टी: पीडीए (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) फॉर्मूले से 2024 में अच्छी खासी दलित वोट हासिल की।
आजाद समाज पार्टी (चंद्रशेखर आजाद): पश्चिमी यूपी में नगीना सीट जीतकर नई चुनौती पेश की।

मायावती आज भी कहती हैं कि बहुजन समाज उनका असली परिवार है और परिवारवाद से पार्टी मुक्त रहेगी। लेकिन आकाश आनंद जैसे उत्तराधिकारियों को लेकर उतार-चढ़ाव और संगठन की कमजोरी साफ दिख रही है। पार्टी का विधानसभा, लोकसभा और जल्द राज्यसभा में भी प्रतिनिधित्व शून्य होने वाला है।

2027 का चुनावी समीकरण और चुनौतियां

2027 यूपी विधानसभा चुनाव से पहले दलित वोट निर्णायक बन गया है। भाजपा अंबेडकर स्थलों के सौंदर्यीकरण और समरसता अभियान पर जोर दे रही है। सपा पीडीए को और मजबूत करने में जुटी है। कांग्रेस भी सामाजिक न्याय के मुद्दे उठा रही है। बसपा अकेले लड़ने का ऐलान कर चुकी है और बूथ स्तर पर संगठन मजबूत करने, वोटर लिस्ट जांच और मजबूत उम्मीदवार चुनने पर फोकस कर रही है।

कांशीराम का फॉर्मूला आज पूरी तरह नहीं मरा है। सपा का पीडीए, राहुल गांधी का सामाजिक न्याय अभियान और चंद्रशेखर का बहुजन कार्ड सभी कहीं न कहीं उसी विरासत से प्रेरित हैं। लेकिन बसपा के हाथ से वह एकजुट बहुजन शक्ति निकल चुकी है। मायावती खुद मानती हैं कि सत्ता हासिल करना ही कांशीराम को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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