
राज्य पुरातत्व विभाग और विशेषज्ञों की समीक्षा बैठक (फोटो सोर्स : Ritesh Singh )
UP Cultural Heritage: उत्तर प्रदेश अब अपने उस चित्रित अतीत को संरक्षित करने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है, जो सदियों से चट्टानों, शैलाश्रयों और प्राचीन स्मारकों की दीवारों पर जीवित है। प्रदेश में प्राचीन शैलचित्रों की डिजिटल मैपिंग और वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण की योजना तैयार की जा रही है। इसके साथ ही 15वीं से 19वीं शताब्दी के बीच बने ऐतिहासिक भित्तिचित्रों की स्थिति का आकलन कर उनके संरक्षण के लिए वैज्ञानिक उपाय तय किए जाएंगे। इस पूरी कवायद का उद्देश्य केवल पुराने चित्रों को बचाना नहीं, बल्कि उनसे जुड़ी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामाजिक जानकारी को भी आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना है।
चट्टानों और शैलाश्रयों पर बने चित्र केवल रंगों और आकृतियों का संग्रह नहीं हैं। इनमें उन समुदायों के जीवन, उनकी कल्पना, मान्यताओं और प्राकृतिक परिवेश से संबंध की झलक मिलती है, जिन्होंने इन्हें हजारों वर्ष पहले बनाया होगा। जानवरों के चित्र, शिकार के दृश्य, नृत्य और दैनिक जीवन से जुड़ी गतिविधियां उस समय के समाज को समझने में शोधकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण आधार बन सकती हैं। इन चित्रों के माध्यम से उन दौर की ऐसी जानकारियां सामने आती हैं, जिन्हें लिखित दस्तावेजों में दर्ज किया जाना संभव नहीं था। यही कारण है कि शैलचित्रों को संरक्षित करना पुरातात्विक धरोहर को बचाने के साथ-साथ मानव सभ्यता के विकास से जुड़े साक्ष्यों को सुरक्षित रखने की प्रक्रिया भी है। प्रदेश सरकार की प्रस्तावित योजना इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
प्रस्तावित कार्यक्रम के पहले चरण में चंदौली, सोनभद्र, मिर्जापुर और आसपास के क्षेत्रों में मौजूद शैलचित्र स्थलों को शामिल करने की योजना है। इन क्षेत्रों में मौजूद प्राचीन शैलाश्रयों और चित्रित चट्टानों का विशेषज्ञों की मदद से दस्तावेजीकरण किया जाएगा। प्रत्येक स्थल की मौजूदा स्थिति का अध्ययन करने के बाद यह तय किया जाएगा कि वहां संरक्षण के लिए किस तरह के तकनीकी हस्तक्षेप की जरूरत है। राज्य पुरातत्व निदेशालय और नई दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) संयुक्त रूप से इस दिशा में काम करेंगे। दोनों संस्थाओं के बीच सितंबर 2025 में हुए समझौते की समीक्षा के बाद आगे की कार्ययोजना तैयार करने पर जोर दिया गया है। अधिकारियों को वार्षिक कार्ययोजना तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं, जिसके आधार पर अलग-अलग स्थलों पर काम आगे बढ़ाया जाएगा।
इस योजना का सबसे अहम हिस्सा शैलचित्र स्थलों की डिजिटल मैपिंग और डिजिटल दस्तावेजीकरण होगा। इसके तहत स्थलों पर मौजूद चित्रों, उनकी स्थिति और उनसे जुड़ी आवश्यक जानकारियों को व्यवस्थित तरीके से दर्ज किया जाएगा। इससे किसी स्थल की मौजूदा स्थिति का प्रमाणिक रिकॉर्ड तैयार हो सकेगा और भविष्य में उसके संरक्षण या अध्ययन के दौरान इसका इस्तेमाल किया जा सकेगा। विशेषज्ञों की ओर से मौके पर निरीक्षण किए जाने के बाद प्रत्येक स्थल की अलग-अलग जरूरतों का आकलन किया जाएगा। कहीं चित्रों को प्राकृतिक क्षरण से खतरा हो सकता है तो कहीं मानवीय गतिविधियों से नुकसान की आशंका हो सकती है। ऐसे में संरक्षण का तरीका भी सभी स्थानों पर एक जैसा नहीं होगा। वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर तकनीकी प्रस्ताव तैयार किए जाएंगे और उसी के अनुरूप आगे की कार्रवाई की जाएगी।
पुरानी कलाकृतियों और चित्रों के संरक्षण में जल्दबाजी नुकसानदायक हो सकती है। इसलिए प्रस्तावित कार्यक्रम में संरक्षण कार्य शुरू करने से पहले विस्तृत अध्ययन और तकनीकी आकलन पर जोर दिया गया है। विशेषज्ञ यह समझने का प्रयास करेंगे कि चित्र किस सतह पर बने हैं, उनकी वर्तमान स्थिति क्या है और समय के साथ उनमें किस तरह के बदलाव आए हैं। इसी आधार पर यह तय किया जाएगा कि किन स्थानों पर तत्काल संरक्षण की जरूरत है और किन स्थलों पर नियमित निगरानी और दस्तावेजीकरण पर्याप्त होगा। डिजिटल रिकॉर्ड तैयार होने के बाद भविष्य में होने वाले बदलावों की तुलना भी की जा सकेगी। इससे संरक्षण कार्य को अधिक व्यवस्थित और वैज्ञानिक बनाने में मदद मिलेगी।
शैलचित्रों के साथ प्रदेश के संरक्षित स्मारकों की दीवारों पर मौजूद ऐतिहासिक भित्तिचित्रों को भी इस पहल में शामिल किया जा रहा है। 15वीं से 19वीं शताब्दी के बीच बने इन चित्रों में उत्तर प्रदेश की बाद की चित्रकला परंपराओं और सांस्कृतिक इतिहास की झलक मिलती है।
स्मारकों की दीवारों पर बने ये भित्तिचित्र समय, मौसम, नमी और अन्य कारणों से प्रभावित होते रहे हैं। कई स्थानों पर चित्रों की मूल चमक और संरचना को बचाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। ऐसे में इनके संरक्षण के लिए भी वैज्ञानिक पद्धति अपनाने की तैयारी है। शैलचित्रों और ऐतिहासिक भित्तिचित्रों को एक व्यापक संरक्षण कार्यक्रम के तहत देखने से प्रदेश की चित्रकला विरासत के विभिन्न कालखंडों को एक साथ समझने का अवसर मिलेगा।
संरक्षण कार्य की सफलता केवल तकनीक और उपकरणों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि उन लोगों की विशेषज्ञता भी महत्वपूर्ण होती है जो मौके पर काम करेंगे। इसी को ध्यान में रखते हुए संरक्षण कार्य से जुड़े तकनीकी अधिकारियों, कारीगरों, सहायकों और अन्य कर्मचारियों के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यशाला आयोजित करने की तैयारी है। कार्यशाला में संबंधित चित्रों के ऐतिहासिक और कलात्मक महत्व के साथ उनके संरक्षण की वैज्ञानिक विधियों की जानकारी दी जाएगी। उद्देश्य यह है कि स्थल पर काम करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को यह समझ हो कि पुरानी चित्रकारी के साथ किस तरह व्यवहार किया जाना चाहिए और किन प्रक्रियाओं से बचना जरूरी है।
अपर मुख्य सचिव, पर्यटन, संस्कृति एवं धार्मिक कार्य अमृत अभिजात ने इस पहल के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि ये चित्र पिछली पीढ़ियों की कहानियां, उनकी कल्पना, मान्यताएं और जीवन शैली अपने भीतर समेटे हुए हैं। उनके अनुसार इनका संरक्षण केवल कला को बचाने का प्रयास नहीं है, बल्कि उस ज्ञान को सुरक्षित रखने की प्रक्रिया भी है जो इन चित्रों में छिपा हुआ है। अभिजात ने अधिकारियों को वार्षिक कार्ययोजना तैयार करने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि प्रदेश की इस विरासत का भरोसेमंद रिकॉर्ड तैयार किया जाए और जिन लोगों को इसके संरक्षण की जिम्मेदारी दी जाएगी, उन्हें आवश्यक समझ और तकनीकी कौशल भी उपलब्ध कराया जाए।
प्रस्तावित योजना केवल दस्तावेजीकरण और संरक्षण तक सीमित नहीं रहेगी। जिन स्थानों पर सर्वेक्षण के दौरान अतिरिक्त पुरातात्विक संभावनाएं सामने आएंगी, वहां पुरातात्विक अन्वेषण और उत्खनन पर भी विचार किया जा सकता है। इससे शैलचित्रों से जुड़े स्थल के व्यापक ऐतिहासिक संदर्भ को समझने में मदद मिल सकती है। हालांकि किसी भी स्थान पर इस तरह की कार्रवाई सर्वेक्षण और विशेषज्ञों के आकलन के आधार पर ही आगे बढ़ाई जाएगी। वार्षिक कार्ययोजना में संबंधित प्रस्तावों को शामिल किया जाएगा और जहां आवश्यक होगा, उन्हें राज्य सरकार के समक्ष रखा जाएगा। जरूरी मामलों में प्रस्ताव मंत्रिमंडल के समक्ष भी भेजे जा सकते हैं।
डिजिटल दस्तावेजीकरण का एक बड़ा लाभ यह होगा कि भविष्य के शोधकर्ताओं को इन स्थलों के अध्ययन के लिए व्यवस्थित सामग्री उपलब्ध हो सकेगी। किसी चित्र या स्थल की वर्तमान स्थिति का रिकॉर्ड सुरक्षित रहने से आने वाले वर्षों में उसके संरक्षण की प्रगति का आकलन भी किया जा सकेगा। इसके साथ ही डिजिटल रिकॉर्ड प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत को व्यापक स्तर पर समझने और प्रस्तुत करने का आधार बन सकता है। शैलचित्रों और ऐतिहासिक भित्तिचित्रों के संरक्षण से प्रदेश के इतिहास, कला और पुरातत्व के अध्ययन को नई दिशा मिलने की उम्मीद है।
इस पूरी पहल में राज्य पुरातत्व निदेशालय और IGNCA की विशेषज्ञता का समन्वय महत्वपूर्ण होगा। सितंबर 2025 में दोनों संस्थानों के बीच हुए समझौते की समीक्षा के बाद अब उसे वार्षिक कार्ययोजना के माध्यम से जमीन पर उतारने की तैयारी है। समीक्षा बैठक में राज्य पुरातत्व निदेशक रेणु द्विवेदी, IGNCA के आदि दृश्य विभाग की प्रमुख प्रो. ऋचा नेगी, संरक्षण विषय की सहायक प्रोफेसर डॉ. सत्येंद्र कुमार, आदि दृश्य विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. दिलीप कुमार संत और उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व निदेशालय के उत्खनन एवं अन्वेषण अधिकारी राम विनय सहित संबंधित अधिकारी और विशेषज्ञ मौजूद रहे।
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Updated on:
25 Sept 2026 01:32 pm
Published on:
25 Sept 2026 01:32 pm
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