
बैराज, बांध और रेगुलेटरों के गेटों के आधुनिकीकरण से सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण को मिली नई ताकत (फोटो सोर्स : Ritesh Singh )
Gomti Barrage: उत्तर प्रदेश में सिंचाई व्यवस्था को मजबूत करने और बाढ़ नियंत्रण की तैयारियों को धार देने के लिए जल संरचनाओं के आधुनिकीकरण पर जोर दिया जा रहा है। योगी सरकार के साढ़े नौ वर्षों के कार्यकाल में प्रदेश की प्रमुख जल संरचनाओं में पुराने और जर्जर हो चुके गेटों को बदलने के साथ आपात स्थिति से निपटने के लिए स्पेयर गेट तैयार कर सुरक्षित रखने का काम भी किया गया है। सरकार का जोर इस बात पर है कि सिंचाई के लिए उपलब्ध पानी की एक-एक बूंद का बेहतर उपयोग हो और बैराज, बांध, हेड रेगुलेटर तथा अन्य जल यांत्रिक संरचनाएं जरूरत के समय पूरी क्षमता से काम कर सकें।
सिंचाई एवं जल संसाधन विभाग के प्रमुख सचिव अनिल गर्ग के मुताबिक लंबे समय तक उपयोग में रहने के कारण प्रदेश की कई महत्वपूर्ण जल संरचनाओं के गेट क्षतिग्रस्त और कमजोर हो गए थे। इन गेटों की स्थिति का आकलन कर प्राथमिकता के आधार पर चरणबद्ध तरीके से उनके निर्माण और प्रतिस्थापन का काम कराया जा रहा है। इसका सीधा उद्देश्य जल संरचनाओं के संचालन में बाधा को दूर करना और सिंचाई के साथ-साथ बाढ़ नियंत्रण व्यवस्था को सुचारु बनाए रखना है।
विभाग की ओर से बताया गया है कि पिछले साढ़े नौ वर्षों में प्रदेश की विभिन्न जल संरचनाओं में बड़े पैमाने पर गेटों का प्रतिस्थापन किया गया है। कई स्थानों पर जहां सभी गेट बदले जा चुके हैं, वहीं कुछ प्रमुख बैराजों में पुराने गेटों को बदलने का काम अभी जारी है। इससे न केवल संरचनाओं की कार्यक्षमता बढ़ाने में मदद मिल रही है, बल्कि भविष्य में संभावित तकनीकी खराबी के जोखिम को भी कम किया जा रहा है।
राजधानी लखनऊ के गोमती बैराज में सभी 10 गेटों का प्रतिस्थापन पूरा किया जा चुका है। यह काम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि गोमती नदी पर स्थित यह बैराज राजधानी की जल प्रबंधन व्यवस्था का अहम हिस्सा है। इसी तरह पीलीभीत स्थित चुक्का हेड रेगुलेटर के सभी चार गेट बदले जा चुके हैं। एटा स्थित तातारपुर एलजीसी एवं पीएलजीसी कनेक्टिंग रेगुलेटर तथा हेड रेगुलेटर के कुल 20 गेटों का भी प्रतिस्थापन पूरा हो चुका है। इन कार्यों के जरिए पुरानी जल यांत्रिक व्यवस्थाओं को आधुनिक और अधिक सुरक्षित बनाने का प्रयास किया गया है। बुलंदशहर स्थित नरौरा बैराज में कुल 61 गेटों में से 13 गेटों का प्रतिस्थापन पूरा हो चुका है, जबकि शेष 48 गेटों के निर्माण और प्रतिस्थापन का कार्य जारी है। विभाग के मुताबिक चरणबद्ध तरीके से इन कार्यों को आगे बढ़ाया जा रहा है, ताकि बैराज के संचालन पर प्रतिकूल असर न पड़े।
प्रदेश के बाहर स्थित महत्वपूर्ण जल संरचनाओं के लिए भी विभाग की ओर से तकनीकी सहयोग और गेट निर्माण का काम किया जा रहा है। दिल्ली स्थित ओखला बैराज के 27 में से 18 गेट बदले जा चुके हैं। इसके अलावा आपात स्थिति में तत्काल प्रतिस्थापन के लिए तीन स्पेयर गेट भी तैयार रखे गए हैं। हरिद्वार स्थित भीमगौड़ा बैराज के 22 में से आठ खराब गेटों को बदला गया है। विभाग के अनुसार इन गेटों का निर्माण बरेली और झांसी स्थित आईएसओ प्रमाणित कार्यशालाओं में किया गया। रामपुर स्थित कैनरी बैराज के 15 में से नौ गेटों का प्रतिस्थापन पूरा हो चुका है, जबकि गाजियाबाद स्थित हिंडन बैराज के सभी आठ गेट बदले जा चुके हैं।
जल संरचनाओं के आधुनिकीकरण में सबसे चुनौतीपूर्ण कार्य पानी के भीतर स्थित गेटों का प्रतिस्थापन रहा है। विभाग के मुताबिक उत्तर प्रदेश में पहली बार अत्यधिक चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में पानी के भीतर स्थित गेटों को आधुनिक इंजीनियरिंग तकनीक और विशेषज्ञ गोताखोरों की मदद से बदला गया।
ललितपुर स्थित माताटीला बांध, मेजा-जरगो लिंक रेगुलेटर और कचनौदा बांध में लगभग 60 से 70 फीट की गहराई पर स्थित अंडर-स्लूइस गेटों का पानी के भीतर प्रतिस्थापन किया गया। कचनौदा बांध में करीब 60 फीट की गहराई पर दो अंडर-स्लूइस गेट बदले गए हैं। साथ ही एक स्पेयर गेट भी सुरक्षित रखा गया है।
पानी के भीतर गेट बदलने का काम सामान्य परिस्थितियों में किए जाने वाले निर्माण कार्यों की तुलना में कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण होता है। इसमें पानी की गहराई, दृश्यता, दबाव और सुरक्षा जैसे कई पहलुओं का ध्यान रखना पड़ता है। ऐसे में विशेषज्ञ गोताखोरों और आधुनिक तकनीक की मदद से इन कार्यों को पूरा किया जाना विभाग के लिए महत्वपूर्ण तकनीकी उपलब्धि के रूप में बताया जा रहा है।
सरकार की रणनीति केवल पुराने गेट बदलने तक सीमित नहीं है। संभावित आपदा या अचानक तकनीकी खराबी की स्थिति में जल प्रबंधन व्यवस्था बाधित न हो, इसके लिए कई प्रमुख जल संरचनाओं के स्पेयर गेट तैयार कर सुरक्षित रखे जा रहे हैं। हमीरपुर के मौदहा, महोबा के लहचूरा, बिजनौर के खो बैराज, बहराइच के घाघरा बैराज और लखीमपुर खीरी के शारदा बैराज जैसी महत्वपूर्ण जल संरचनाओं के लिए भी स्पेयर गेट तैयार किए गए हैं। विभाग का मानना है कि किसी गेट में अचानक खराबी आने पर नया गेट तैयार कराने में लगने वाला समय बचाया जा सकेगा और तत्काल प्रतिस्थापन कर सिंचाई व्यवस्था को प्रभावित होने से बचाया जा सकेगा।
चंदौली के चंद्रप्रभा बांध में करीब 80 फीट की गहराई पर स्थित अंडर-स्लूइस गेटों से रिसाव की समस्या को भी विभाग ने गंभीरता से लिया है। अधिकारियों के अनुसार रिसाव के कारण सिंचाई योग्य पानी की बर्बादी हो रही थी और आसपास के किसानों के लिए भी चिंता की स्थिति बनी हुई थी। मुख्य अभियंता यांत्रिक उपेंद्र सिंह के अनुसार निरीक्षण के बाद अधिकारियों को रिसाव रोकने के लिए तत्काल प्रभावी कदम उठाने के निर्देश दिए गए। विशेषज्ञ गोताखोरों और आधुनिक तकनीक की मदद से पानी के भीतर मौजूद रिसाव को स्थायी रूप से बंद करने पर जोर दिया गया है। कार्य की गुणवत्ता से किसी प्रकार का समझौता न करने और इसेसमयबद्ध तरीके से पूरा करने के निर्देश भी दिए गए हैं।
जल संरचनाओं के गेटों का आधुनिकीकरण केवल सिंचाई व्यवस्था से जुड़ा विषय नहीं है। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े और भौगोलिक रूप से विविध राज्य में बैराज और बांधों की भूमिका बाढ़ नियंत्रण में भी महत्वपूर्ण है। बारिश के दौरान जलस्तर बढ़ने पर इन संरचनाओं के गेटों का सही समय पर और सुरक्षित तरीके से संचालन जरूरी होता है। ऐसे में पुराने गेटों को बदलने और स्पेयर गेट तैयार रखने से आपात परिस्थितियों में विभाग की प्रतिक्रिया क्षमता बढ़ सकती है। वहीं सिंचाई के मौसम में नहरों में पर्याप्त पानी पहुंचाने के लिए भी जल संरचनाओं का सुचारु संचालन आवश्यक है। सरकार का दावा है कि इसी दोहरे उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए जल यांत्रिक संरचनाओं के आधुनिकीकरण को प्राथमिकता दी जा रही है।
सरकार की जल प्रबंधन नीति में किसानों को सिंचाई का पानी समय पर उपलब्ध कराना प्रमुख लक्ष्य बताया गया है। जल संरचनाओं में तकनीकी खराबी के कारण यदि नहरों में पानी का प्रवाह बाधित होता है तो इसका सीधा असर कृषि पर पड़ सकता है। इसी वजह से विभाग पुराने गेटों के प्रतिस्थापन के साथ-साथ वैकल्पिक व्यवस्था तैयार करने पर भी जोर दे रहा है।स्पेयर गेटों की उपलब्धता से किसी आकस्मिक स्थिति में मरम्मत या प्रतिस्थापन के लिए लंबा इंतजार नहीं करना पड़ेगा। इससे सिंचाई जल की आपूर्ति बनाए रखने में मदद मिल सकती है। सरकार का जोर इस बात पर है कि जल संसाधनों का अधिकतम उपयोग हो और संरचनाओं की खराबी के कारण पानी की बर्बादी को न्यूनतम किया जा सके।
साढ़े नौ वर्षों में जल संरचनाओं के गेटों के निर्माण और प्रतिस्थापन के साथ पानी के भीतर कठिन परिस्थितियों में तकनीकी कार्य किए जाने से विभाग की क्षमता में भी इजाफा हुआ है। आईएसओ प्रमाणित कार्यशालाओं में गेट निर्माण, विशेषज्ञ गोताखोरों की मदद से अंडर-स्लूइस गेटों का प्रतिस्थापन और संवेदनशील बैराजों के लिए स्पेयर गेट तैयार रखना इसी दिशा में उठाए गए कदम बताए जा रहे हैं। अब चुनौती इन संरचनाओं के नियमित रखरखाव और समय-समय पर तकनीकी निरीक्षण की बनी रहेगी। यदि आधुनिकीकृत गेटों का नियमित रखरखाव, समयबद्ध निरीक्षण और आपातकालीन तैयारियों को लगातार बनाए रखा जाता है तो इससे प्रदेश की सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण व्यवस्था को लंबे समय तक मजबूती मिल सकती है।
Updated on:
05 Oct 2026 04:03 pm
Published on:
05 Oct 2026 04:03 pm
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