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गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा था भारत, फिर मनमोहन सिंह ने उठाए थे बड़े कदम

India Economic Reforms: 1991 के आर्थिक संकट से भारत को निकालने की कोशिशों से लेकर प्रधानमंत्री बनने तक, जानिए मनमोहन सिंह का सफर, बड़े आर्थिक सुधार और उनके दस साल के कार्यकाल की कहानी।
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भारत

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Saurabh Mall

•

Sep 26, 2026

manmohan singh

फोटो में भारत के पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह (सोर्स- ANI)

Manmohan Singh India Economic Reforms: 1991 का दौर भारत के लिए बेहद मुश्किल था। देश का विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से घट रहा था। आयात के भुगतान को लेकर चिंता बढ़ गई थी। अर्थव्यवस्था दबाव में थी। ऐसे समय में पी.वी. नरसिम्हा राव की सरकार ने अर्थशास्त्री डॉ. मनमोहन सिंह को वित्त मंत्री की जिम्मेदारी दी। इसके बाद देश की आर्थिक नीतियों में बड़े बदलावों की शुरुआत हुई। यही दौर आगे चलकर मनमोहन सिंह की पहचान बना। वित्त मंत्री से प्रधानमंत्री तक का उनका सफर भारतीय राजनीति का एक अहम अध्याय है।

1991 का संकट और आर्थिक सुधार

बता दें मनमोहन सिंह लंबे समय से आर्थिक नीति से जुड़े रहे थे। उन्होंने 1971 में सरकार के वाणिज्य मंत्रालय में आर्थिक सलाहकार के तौर पर काम शुरू किया। इसके बाद वे मुख्य आर्थिक सलाहकार और वित्त मंत्रालय में सचिव जैसे पदों पर रहे। इसके बाद वे रिजर्व बैंक के गवर्नर भी बने। 1991 में उन्हें वित्त मंत्री बनाया गया। उस समय भारत भुगतान संतुलन के गंभीर संकट से जूझ रहा था। विदेशी मुद्रा की कमी बड़ी चुनौती थी। ऐसे में संकट से निपटने के लिए कई बड़े फैसले लिए गए। रुपये का अवमूल्यन किया गया। औद्योगिक लाइसेंस व्यवस्था में बदलाव हुआ। आयात-निर्यात नीति में सुधार किए गए। विदेशी निवेश के लिए भी अर्थव्यवस्था को खोलने की प्रक्रिया शुरू हुई।

24 जुलाई 1991 को पेश बजट में इन सुधारों की दिशा साफ दिखाई दी। सरकार की भूमिका को नियंत्रक (जो कंट्रोल करता है) से सुविधाकर्ता (Facilitator) बनाने पर जोर दिया गया। इन कदमों को भारत की आर्थिक उदारीकरण (liberalization) प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

अर्थशास्त्री से देश के प्रधानमंत्री तक

1991 से मनमोहन सिंह राज्यसभा के सदस्य रहे। उन्होंने संसद में लंबी राजनीतिक पारी निभाई। 1998 से 2004 के बीच वे राज्यसभा में विपक्ष के नेता भी रहे।

2004 के लोकसभा चुनाव के बाद 22 मई को उन्होंने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। वे ऐसे प्रधानमंत्री बने, जिन्होंने लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा था। 2009 में उन्होंने लगातार दूसरी बार प्रधानमंत्री पद संभाला। प्रधानमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल मई 2014 तक रहा। उनके दस वर्षों के कार्यकाल में आर्थिक विकास के साथ सामाजिक कल्याण और अधिकार आधारित नीतियों पर भी जोर रहा।

RTI, रोजगार कानून और परमाणु समझौता

बता दें मनमोहन सिंह सरकार के पहले कार्यकाल में सूचना का अधिकार कानून यानी RTI लागू हुआ। ग्रामीण रोजगार की गारंटी से जुड़ा नरेगा (NREGA) भी इसी दौर की प्रमुख पहल थी। इन कानूनों ने पारदर्शिता और ग्रामीण रोजगार को नीति के केंद्र में रखा। भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौता भी उनकी सरकार की बड़ी पहलों में शामिल रहा। इसे भारत के परमाणु क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय अलगाव कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम के रूप में प्रस्तुत किया गया।

अब जरा ये भी समझ लीजिये- क्या होता है असैन्य परमाणु समझौता?

बता दें असैन्य परमाणु समझौता का मतलब ये होता है कि दो देशों के बीच परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण और नागरिक उपयोग (जैसे बिजली उत्पादन, चिकित्सा और अनुसंधान) के लिए परमाणु ईंधन, तकनीक और उपकरणों के आदान-प्रदान की अनुमति देता है।

भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना

2009 के बाद उनके दूसरे कार्यकाल में आर्थिक विकास, बुनियादी ढांचे और सामाजिक कल्याण से जुड़े मुद्दे प्रमुख रहे। इसी दौरान सरकार को भ्रष्टाचार के आरोपों और कई राजनीतिक विवादों का भी सामना करना पड़ा।

मनमोहन सिंह की पूरी यात्रा को देखें तो उनकी पहचान एक पारंपरिक जननेता से अलग रही। वे पहले अर्थशास्त्री और नीति-निर्माता के रूप में सामने आए। फिर वित्त मंत्री बने। इसके बाद दस साल तक देश के प्रधानमंत्री रहे। 1991 के आर्थिक संकट से शुरू हुआ उनका सफर भारतीय अर्थव्यवस्था और राजनीति के एक महत्वपूर्ण दौर से जुड़ा रहा।