मौलवी मीरवाइज उमर फारूक ने आगे कहा कि हर साल हमारे कैलेंडर में ये तारीखें पिछले तीन दशकों में गांव कदल, जकूरा, हवाल, सोपोर, वंधामा, चिट्टीसिंहपुरा जैसी जगहों पर हुई ऐसी ही त्रासदियों के हमारे जख्मों को फिर से ताजा कर देती हैं। इसमें हजारों कीमती जानें गईं। जम्मू कश्मीर के लोगों का अहिंसा और बातचीत के जरिए सम्मान के साथ स्थायी शांति में विश्वास और इच्छा अटूट है। हम उम्मीद और दुआ करते हैं कि ऐसी भयानक घटनाएं हमेशा के लिए अतीत की बात बन जाएं।