
योगी आदित्यनाथ, मायावती और मुलायम सिंह यादव (फोटो-पत्रिका)
UP CM Yogi Adityanath: योगी आदित्यनाथ ने जब उत्तर प्रदेश की गद्दी संभाली, तब उन पर उम्मीद और अपेक्षाओं का भार कुछ ज्यादा था। एक तरफ शीर्ष नेतृत्व के भरोसे पर खरा उतरना था, दूसरी तरफ जनता की उम्मीदों को पूरा करना था। योगी के पास राजनीति में लंबा अनुभव था, लेकिन सीएम की कुर्सी उन्हें पहली बार मिली थी। 100 दिन का एजेंडा तैयार हुआ, सभी मंत्रियों को काम पर लगाया गया, अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश मिले कि विकास की फाइलों पर देरी की धूल जमने न पाए। मैराथन बैठकों का दौर शुरू हुआ, योगी खुद समीक्षा करते, निर्देश देते। कैबिनेट मंत्रियों से एक-दूसरे के कामकाज को भी विस्तार से समझने को कहा गया। योगी ने ऐसा ईकोसिस्टम तैयार किया कि सबको, सबकी खबर हो।
योगी कैबनेट का हरेक मंत्री अपने विभाग की प्रेजेंटेशन तैयार करता और हर शाम छह बजे उसकी प्रस्तुति होती। राज्य के वरिष्ठ अधिकारियों और मुख्यमंत्री कार्यालय के वरिष्ठ अधिकारियों सहित प्रत्येक मंत्री अपनी टीम के साथ मौजूद रहता। विकास की रूपरेखा, भविष्य की चुनौतियों और उनके समाधान पर बाती होती, रणनीति बताई जाती।
इस दौरान, सीएम योगी आदित्यनाथ खुद भी उपस्थित रहते, हर एक प्रेजेंटेशन को ध्यान से सुनते। अच्छे पर शाबाशी देते और सुधार की गुंजाइश पर सलाह। आदित्यनाथ के जीवन पर आधारित किताब ‘द मॉन्क हू बिकेम चीफ मिनिस्टर’ (The Monk Who Became Chief Minister) के अनुसार, प्रेजेंटेशन शुरू होने का समय निर्धारित था शाम 6 बजे, लेकिन उसके खत्म होने का कोई समय तय नहीं था। कभी ये रात 11 बजे तक चलती, तो कभी अगले दिन तक। योगी की ये पहल सभी मंत्रियों के लिए बेहद उपयोगी साबित हुई। इससे उन्हें एक-दूसरे को जानने, एक-दूसरे की क्षमताओं को समझने, दूसरे मंत्रियों के विभागों के बारे में जानकारी हासिल करने और सबसे महत्वपूर्ण बात - अपने मुखिया योगी आदित्यनाथ की प्राथमिकताओं को समझने का अवसर मिला।
इन प्रेजेंटेशन के दौरान योगी ने सभी को आश्चर्यचकित करते हुए प्रशासनिक मामलों का असाधारण ज्ञान, बजट प्रक्रिया की गहरी समझ और सरकारी कामकाज की विस्तृत जानकारी प्रदर्शित की। योगी के सहयोगियों एवं नौकरशाही को यह अहसास हुआ कि संसद में दो दशकों तक लगातार सक्रिय रहने, अपने निर्वाचन क्षेत्र में जमीनी स्तर पर काम करने और प्राचीन गोरखनाथ मठ की कई बड़ी संस्थाओं का प्रशासन संभालने के अनुभव ने उन्हें एक स्वाभाविक नेता और कुशल प्रशासक बना दिया है।
योगी आदित्यनाथ की सबसे अच्छी बात ये है कि जनता से जुड़े मुद्दों पर वह घड़ी देखकर चर्चा नहीं करते। वह तब तक चर्चा करते रहते हैं, जब तक किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा जाते। लेखक शांतनु गुप्ता की इस किताब में योगी मंत्रिमंडल के तात्कालीन वरिष्ठ मंत्री एस.पी. सिंह बघेल का जिक्र है, जिन्होंने समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी में कई वर्ष बिताए हैं। एक बार जब उनसे योगी आदित्यनाथ की शासन चलाने की शैली और पिछले मुख्यमंत्रियों की शैली में अंतर के बारे में पूछा गया, तो उनके जवाब ने यह बता दिया कि योगी दूसरों से क्यों अलग हैं।
किताब में लिखा है कि इस सवाल पर बघेल ने कहा - मायावती के शासनकाल में मंत्रिमंडल की बैठकें साढ़े तीन से सात मिनट तक चलती थीं, जबकि मुलायम सिंह के समय मंत्रिमंडल की बैठकें 15 मिनट में खत्म हो जाती थीं। लेकिन योगी राज में मंत्रिमंडल की बैठकें को छोड़िए, विभागीय प्रस्तुतियों के दौरान भी सभी मंत्री और वरिष्ठ अधिकारी देर रात तक बैठे रहते हैं।
हल्के-फुल्के अंदाज़ में बघेल ने आगे कहा कि उनमें से शायद ही कुछ लोगों ने किसी हिट फिल्म का रात 6 से 9 का शो देखा हो, लेकिन यहां सभी एक महीने तक शाम 6 बजे से आधी रात 12 बजे तक बैठकर एक-दूसरे के विभागों को समझते रहे और सरकार के कामकाज के बारे में सीखते रहे।
बघेल ने यह भी बताया कि मायावती के शासनकाल में पार्टी के विधायकों तक को मुख्यमंत्री से मिलने का अवसर नहीं मिलता था। कभी-कभार जब मायावती उन्हें अपने पास बुलाती थीं, जिससे विधायकों के मन में किसी अप्रत्याशित नतीजे की आशंका से घबराहट पैदा हो जाती थी। जबकि मुख्यमंत्री योगी ने अब राज्य के विधायकों और सांसदों से मुलाकात के लिए विशेष दिन और समय निर्धारित कर दिए हैं।
किताब में एक ऐसे किस्से का भी जिक्र है, जिसकी कल्पना शायद कभी सीएम आदित्यनाथ ने भी नहीं की होगी। यूं तो योगी आदित्यनाथ खुद जनता की समस्या सुनते हैं और उनका समाधान भी करते हैं। उनका ‘जनता दरबार’ सभी के लिए खुला है। एक बार लखनऊ में आयोजित जनता दरबार में कैंसर से पीड़ित एक मरीज इलाज के लिए मदद मांगने आया।
सीएम योगी को लगा कि वे मरीज को पिछली अखिलेश सरकार द्वारा उद्घाटित नए कैंसर अस्पताल में भेज सकते हैं। योगी ने संबंधित मंत्री से अस्पताल जाकर वहां की व्यवस्थाओं का जायज़ा लेने को कहा। जब मंत्री ने लौटकर उन्हें जानकारी दी, तो वे यह जानकर हैरान रह गए कि वहां केवल अस्पताल की इमारत खड़ी की गई थी। न कीमोथेरेपी के उपकरण थे, न रेडियोलॉजी की व्यवस्था, न डॉक्टर और न ही कर्मचारी। उद्घाटन के दिन किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) अस्पताल से कुछ बिस्तर लाए गए थे, जिन्हें बाद में वापस लौटा दिया गया।
‘द मॉन्क हू बिकेम चीफ मिनिस्टर’ में यह भी लिखा है – जनता दरबार के शुरुआती दिनों में प्रतिदिन 25 से 30 मुस्लिम महिलायें पहुंचती थीं। वे अपने पिता, माता, भाइयों या अन्य रिश्तेदारों के साथ आती हैं। इन सभी की समस्या लगभग एक जैसी होती है - उनके पतियों ने उन्हें फोन पर या कागज के एक टुकड़े पर लिखकर तलाक दे दिया है।
Updated on:
13 Oct 2026 03:54 pm
Published on:
13 Oct 2026 03:28 pm
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