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कोई पत्नी के कैंसर के इलाज, तो कोई दिवाली के लिए जुटा रहा था पैसा! दिल्ली फैक्ट्री अग्निकांड के 4 पीड़ितों की झकझोर देने वाली दास्तान

Delhi Mangolpuri shoe factory fire: उत्तर-पश्चिम दिल्ली के मंगोलपुरी स्थित एक जूता फैक्ट्री में लगी भीषण आग ने चार परिवारों की खुशियां हमेशा के लिए छीन लीं।
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नई दिल्ली

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Dinesh Dubey

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Updated: 1 Nov 2026, 11:16 AM IST

Delhi Mangolpuri shoe factory fire

दिल्ली जूता फैक्ट्री अग्निकांड के पीड़ित परिवारों पर टूटा दुखों का पहाड़ (Photo: X/@teztarrardelhi)

Delhi Factory Fire: दिल्ली के मंगोलपुरी स्थित जूता फैक्ट्री में शुक्रवार रात लगी भीषण आग ने चार परिवारों की खुशियां छीन लीं। इस हादसे में जान गंवाने वाले चार मजदूरों की कहानियां बेहद दर्दनाक हैं। मारे गए सभी 4 मजदूर अपने-अपने परिवारों के इकलौते कमाऊ सदस्य थे। कोई अपनी पत्नी के कैंसर के इलाज के लिए डबल शिफ्ट कर रहा था, तो कोई आने वाले त्यौहारों पर घर ज्यादा पैसे भेजने की उम्मीद में रात भर काम करने के लिए रुका हुआ था।

हाथ की मेहंदी भी नहीं छूटी थी, उजड़ गया गायत्री का संसार

हरिहर (40) की पत्नी गायत्री के हाथों में करवा चौथ पर लगाई गई मेहंदी का रंग अभी पूरी तरह उतरा भी नहीं था कि उनकी दुनिया उजड़ गई। शनिवार को वह संजय गांधी मेमोरियल अस्पताल के मुर्दाघर के बाहर बैठकर रो रही थीं। उनका 10 वर्षीय बेटा अंश हर बार मां के रोने पर उनका हाथ कसकर पकड़ लेता था। 13 वर्षीय बेटी अंजलि भी मां के पास बैठी थी, जबकि 15 वर्षीय बेटा हिमांशु स्ट्रेचर पर रखे अपने पिता के शव के पास खड़ा था।

हरिहर परिवार के इकलौते कमाने वाले सदस्य थे। वह पिछले 20 साल से अधिक समय से उत्तर-पश्चिमी दिल्ली के मंगोलपुरी स्थित जूता फैक्ट्री में काम कर रहे थे। धीरे-धीरे उनका वेतन बढ़कर 35 हजार रुपये हो गया था। त्योहारों के सीजन में वह परिवार की जरूरतें पूरी करने और कुछ अतिरिक्त पैसे कमाने के लिए अक्सर डबल शिफ्ट करते थे।

शुक्रवार को भी हरिहर देर रात तक फैक्ट्री में काम कर रहे थे। परिवार के लिए यह कोई नई बात नहीं थी। उस दिन भी फैक्ट्री के अन्य कर्मचारी खाना खाने बाहर गए थे, लेकिन हरिहर ने घर फोन कर खाना मंगवाया। इसके बाद उनका 15 वर्षीय बेटा हिमांशु रोज की तरह खाना लेकर फैक्ट्री पहुंचा। गायत्री को इस बात का अंदाजा भी नहीं था कि उस रात की बातचीत उनकी आखिरी बातचीत साबित होगी।

फैक्ट्री में शुक्रवार रात लगी भीषण आग में हरिहर समेत चार मजदूरों की मौत हो गई। अब गायत्री के सामने तीन बच्चों की परवरिश और परिवार चलाने की बड़ी जिम्मेदारी है। उन्होंने फैक्ट्री प्रबंधन की लापरवाही पर सवाल उठाते हुए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।

वीडियो कॉल पर पत्नी और बेटी से आखिरी बातचीत, फिर कट गया फोन

इस हादसे में जान गंवाने वाले दूसरे मजदूर अशोक (25) की कहानी भी बेहद दर्दनाक है। बिहार के फुलपरास के रहने वाले अशोक पिछले 14-15 साल से इसी फैक्ट्री में काम कर रहे थे। उन्हें हर महीने करीब 16 हजार रुपये वेतन मिलता था। अशोक अपने पीछे गर्भवती पत्नी और दो मासूम बेटियों को छोड़ गए हैं।

अशोक के चाचा उमेश के मुताबिक, हादसे से कुछ मिनट पहले रात करीब 9:20 बजे अशोक वीडियो कॉल पर अपनी पत्नी से बात कर रहे थे। इस दौरान वह वीडियो कॉल के जरिए अपनी छोटी बेटी के साथ खेल भी रहे थे। तभी अचानक उन्होंने परिवार को बताया कि फैक्ट्री में आग लग गई है और वह बाहर निकलने का रास्ता तलाश रहे हैं। इसके कुछ ही देर बाद वीडियो कॉल कट गया।

अशोक फैक्ट्री के डाईंग सेक्शन में काम करते थे। वह भी अतिरिक्त कमाई के लिए अक्सर ओवरटाइम करते थे। साल में दो बार फैक्ट्री में अधिक काम होता था। अगस्त से दिसंबर के बीच त्योहारों के सीजन में वह बिहार से दिल्ली आते थे, ताकि कुछ अतिरिक्त पैसे कमा सकें और फिर घर लौट सकें।

15 साल फैक्ट्री में किया काम, रोकर बहन ने बयां किया दर्द

हादसे में जान गंवाने वाले तीसरे मजदूर लाल बाबू चौहान (38) उत्तर प्रदेश के रहने वाले थे। उनकी बहन हेवंती देवी के मुताबिक, यह फैक्ट्री उनके भाई का पहला और आखिरी कार्यस्थल थी। वह करीब 15 साल से यहां काम कर रहे थे।

लाल बाबू सुल्तानपुरी की एक झुग्गी में अकेले रहते थे और अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा गांव में परिवार को भेजते थे। भाई की मौत से सदमे में आई बहन ने कहा, "कुछ दिन पहले ही मैं उनसे मिली थी। आज उन्हीं का शव लेने के लिए मुर्दाघर के बाहर खड़ी हूं।"

उन्होंने फैक्ट्री मालिक के प्रति नाराजगी जताते हुए आरोप लगाया कि हादसे के बाद पीड़ित परिवारों की मदद के लिए कोई आगे नहीं आया।

पत्नी के कैंसर के इलाज के लिए करते थे नाइट शिफ्ट, घर का इकलौता सहारा थे प्रेमचंद

फैक्ट्री अग्निकांड में जान गंवाने वाले चौथे मजदूर प्रेमचंद (50) की मौत से भी परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। प्रेमचंद दिल्ली के प्रेम नगर इलाके में रहते थे और पिछले 10 साल से जूता फैक्ट्री में काम कर रहे थे। वह डाईंग सेक्शन में काम करते थे और हर महीने करीब 14 हजार रुपये कमाते थे।

पत्नी के कैंसर के इलाज का खर्च उठाने और परिवार की आर्थिक जरूरतें पूरी करने के लिए वह अक्सर नाइट शिफ्ट और ओवरटाइम करते थे। उनकी पत्नी का इलाज दिल्ली के एलएनजेपी अस्पताल में चल रहा था।

उनके बेटे रमेश कुमार झा के मुताबिक, शुक्रवार रात करीब 8:30 बजे पिता का फोन आया था। उन्होंने बताया था कि उस रात वह घर नहीं लौटेंगे और डबल शिफ्ट करेंगे।

रमेश ने मां की बीमारी और इलाज के कारण अपनी नौकरी छोड़ दी थी। ऐसे में परिवार की पूरी आर्थिक जिम्मेदारी प्रेमचंद के कंधों पर थी।

परिवार को उनकी मौत की खबर एक परिचित के फोन से मिली। इसके बाद परिजन अस्पताल पहुंचे, जहां उन्हें पता चला कि फैक्ट्री में लगी आग के दौरान दम घुटने से प्रेमचंद की मौत हो गई।