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महानदी की सेहत का एक्स-रे… 34 रिपोर्ट में सामने आया पानी का पूरा सच, कहीं भूजल संकट तो कहीं बाढ़ का खतरा

Mahanadi Water Crisis: महानदी बेसिन में पानी की उपलब्धता, भूजल, बाढ़ और बदलती जलवायु के बढ़ते दबाव की पूरी तस्वीर अब 34 तकनीकी रिपोर्ट में सामने आई है।
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रायपुर

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Khyati Parihar

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ताबीर हुसैन

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Oct 05, 2026

Mahanadi River Basin

महानदी की सेहत का एक्स-रे (फोटो सोर्स- पत्रिका)

रायपुर@ताबीर हुसैन। Mahanadi River Basin: महानदी के पानी, भूजल और बदलते जलवायु दबाव को समझने के लिए छत्तीसगढ़ में पहली बार बेसिन स्तर पर विस्तृत वैज्ञानिक आकलन को एकीकृत रूप दिया गया है। एनआईटी रायपुर स्थित महानदी नदी बेसिन प्रबंधन एवं अध्ययन केंद्र (कैंप महानदी) ने एनआईटी राउरकेला और विभिन्न शासकीय विभागों के सहयोग से छत्तीसगढ़ क्षेत्र का अध्ययन पूरा किया है।

इसमें जल विज्ञान, भूजल, जलवायु, कृषि, भूमि उपयोग, बाढ़, जल मांग, प्रदूषण, जैव विविधता और नदी-जनजीवन जैसे विषयों को एक साथ देखा गया है। महानदी को लेकर छत्तीसगढ़ और ओडिशा के बीच जल बंटवारे का विवाद लंबे समय से चल रहा है। दोनों राज्यों के बीच पानी की उपलब्धता और उपयोग के आंकड़ों को लेकर महानदी जल विवाद न्यायाधिकरण में सुनवाई जारी रही। ऐसे में कैंप महानदी का आंकड़ा आधारित अध्ययन नदी बेसिन के दीर्घकालिक और समन्वित प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण आधार बन सकता है।

मौसमी और क्षेत्रीय मांग का बढ़ रहा दबाव

कैंप महानदी के तहत कुल 34 तकनीकी रिपोर्ट तैयार की गई हैं। पहले चरण में 17 रिपोर्ट में जल विज्ञान, जलगतिकी, भूविज्ञान, नदी एटलस, जलवायु, स्थलाकृति, आधारभूत संरचना और नदी-जनजीवन का अध्ययन किया गया। नवंबर 2025 की समीक्षा के बाद दूसरी 17 रिपोर्ट में भू-आकृति विज्ञान, जल मांग, बाढ़ जोखिम, जलवायु परिवर्तन, भूमि उपयोग, जल संतुलन, जैव संसाधन, अपशिष्ट प्रबंधन और भूजल जैसे विषय शामिल किए गए।

अध्ययन में सामने आया है कि छत्तीसगढ़ के महानदी बेसिन में पानी की स्थिति अब केवल उपलब्धता का विषय नहीं रही, बल्कि मौसमी और क्षेत्रीय मांग का दबाव बढ़ रहा है। बेसिन में वार्षिक वर्षा का करीब 85.7 प्रतिशत हिस्सा जून से सितंबर के बीच मिलता है। इसके कारण वर्ष के बाकी महीनों में जलाशयों और भूजल पर निर्भरता बढ़ जाती है।

धान की खेती से बढ़ा पानी का दबाव

अध्ययन के अनुसार, महानदी बेसिन क्षेत्र में धान की खेती में हर साल करीब 9.5 से 10.1 अरब घन मीटर पानी की खपत होती है। यह अनुमानित वार्षिक जल उपलब्धता का करीब 13 से 17 प्रतिशत है। राज्य के सकल सिंचित क्षेत्र का लगभग 75 से 83 प्रतिशत हिस्सा धान के अंतर्गत है। वहीं, औसतन 61 प्रतिशत कृषि जोतें एक हेक्टेयर से कम क्षेत्रफल वाली हैं।

अध्ययन में कहा गया है कि सिंचाई का विस्तार अकेले समाधान नहीं है। जल उपयोग दक्षता, फसल विविधीकरण और उपलब्ध पानी के आधार पर जिलेवार कृषि नियोजन जरूरी है। सबसे बड़ी चिंता भूजल को लेकर सामने आई है। महानदी बेसिन में भूजल दोहन का औसत स्तर 2004 के 30.6 प्रतिशत से बढक़र 2025 में 55.6 प्रतिशत हो गया। शिवनाथ उप-बेसिन के बेरला में 97.29, धरसींवा में 96.81, गुरुर में 93.87, बेमेतरा में 91.99 और नवागढ़ में 90.78 प्रतिशत भूजल दोहन दर्ज किया गया है।

बाढ़ से लेकर रायपुर के नालों तक बनेगी योजना

प्रो. समीर बाजपेयी, हेड, सेंटर फॉर महानदी रिवर बेसिन मैनेजमेंट एंड स्टडीज के मुताबिक, अध्ययन में नदी के बाढ़ मैदान, धाराओं और नदी तल की संरचना का भी विस्तृत आकलन किया गया है। इसके आधार पर बाढ़ प्रबंधन को केवल तटबंध या अलग-अलग संरचनाओं तक सीमित रखने के बजाय जलाशयों के समन्वित संचालन, बाढ़ मैदान निर्धारण और पूर्व चेतावनी प्रणाली से जोडऩे की जरूरत बताई गई है।

रायपुर में आमासिवनी-छोकरा नाला प्रणाली को जिला नदी प्रबंधन योजना के पायलट के रूप में लिया गया है। छोकरा नाले की मुख्य धारा 34.251 किलोमीटर और कुल 66 जलधाराओं की लंबाई करीब 167.10 किलोमीटर आंकी गई है। इसे नौ उप-जलग्रहण क्षेत्रों में बांटकर वर्षा जल, अपवाह, अपशिष्ट जल और उपचार स्थलों का अध्ययन किया गया है।