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शरीर को प्रभु का मंदिर मानकर करे साजसंभाल

कोरोना के इस संकट काल में अगर व्यक्ति प्रकृति के नियम अनुसार अपना जीवन बना ले, तो वह असाध्य रोगों से मुक्ति प्राप्त कर लेता है। शरीर को प्रभु का मंदिर मानकर इसकी साजसंभाल करे, तो यह शरीर स्वस्थ रहेगा। व्याधियां तभी उत्पन्न होती है, जब इस शरीर को अवांछित द्रव्यों से अनावश्यक रूप से भरा जाता है। शरीर की प्राथमिक आवश्यकता सात्विक भोजन है, जो सहज रूप से पूरी हो सकती है।

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Singrauli NTPC: Mahavir Swami jayanti in Jain Temple Vindhyachal

Singrauli NTPC: Mahavir Swami jayanti in Jain Temple Vindhyachal

रतलाम। कोरोना के इस संकट काल में अगर व्यक्ति प्रकृति के नियम अनुसार अपना जीवन बना ले, तो वह असाध्य रोगों से मुक्ति प्राप्त कर लेता है। शरीर को प्रभु का मंदिर मानकर इसकी साजसंभाल करे, तो यह शरीर स्वस्थ रहेगा। व्याधियां तभी उत्पन्न होती है, जब इस शरीर को अवांछित द्रव्यों से अनावश्यक रूप से भरा जाता है। शरीर की प्राथमिक आवश्यकता सात्विक भोजन है, जो सहज रूप से पूरी हो सकती है।

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यह बात शांत क्रांति संघ के नायक, जिनशासन गौरव, प्रज्ञानिधि, परम श्रद्वेय आचार्यप्रवर 1008 श्री विजयराजजी मसा ने कही। सिलावटो का वास स्थित नवकार भवन में विराजित आचार्यश्री ने धर्मानुरागियों को प्रसारित संदेश में कहा कि तामसिक भोजन शरीर तंत्र को खराब करता है और भाव तंत्र पर भी कुल्हाडी चलाता हैं। भाव तंत्र का सिस्टम खराब होते ही शरीर तंत्र गडबडा जाता है। अन्न, जल और हवा पवित्र तथा शुद्ध होना चाहिए। ये शरीर के वे पोषक तत्व है, जिनके अभाव में स्वस्थ स्वास्थ्य की कल्पना नहीं की जा सकती। प्रदूषणों के दौर में ये तीनो तत्व शुद्ध और पवित्र नहीं रह पाए है। इससे विचार भी प्रदूषित होते जा रहे है। उन्होंने कहा कि विचारों को असंयम प्रदूषित करता हैं, जबकि संयममय विचार व्यक्ति का कायाकल्प कर सकते है। असंयम सारी समस्याओं का मूल है, तो संयम सारी समस्याओं का समाधान है। संयममय जीवन प्राकृतिक जीवन होता है, जो स्वस्थ स्वास्थ्य का नियामक होता है।

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प्रकृति का नियम स्वस्थ स्वास्थ्य

आचार्यश्री ने बताया कि प्रकृति का नियम स्वस्थ स्वास्थ्य है, बिमारी नहीं। बिमारियां व्यक्ति की अज्ञता,अज्ञानता से उत्पन्न होती है। खानपान का असंयम, रहन-सहन का असंतुलन, चाल-चलन का अनियंत्रण आदि अनेक बिमारियों को आमंत्रण देते है। व्यक्ति अगर प्रकृति के अनुरूप जीवन जीता है, तो वह ना केवल स्वस्थ बल्कि उत्तम आरोग्य को प्राप्त करता है। प्राकृतिक जीवन व्यक्ति के भाव तंत्र को पवित्र, विशुद्ध और निर्विकार रखता हैं। इससे शरीर तंत्र स्वस्थ और निरामय रहता है। वर्तमान जीवन शैली प्रकृति के विरूद्ध जा रही है। इससे मानव अनेक तरह की व्याधियों से जकडता जा रहा है।

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जीवन यात्रा में सफल नहीं हो पाता

उन्होंने कहा कि शिक्षा आदमी को जीवन दृष्टि देने वाली होनी चाहिए, लेकिन आज की शिक्षा पद्धति में संयम की कोई बात नहीं है। भोग-विलास, ऐशो-आराम पर टिकी शिक्षा पद्धति जीवन को सही दिशा और दृष्टि नहीं दे पा रही है। इसके परिणाम स्वरूप शरीर अस्वस्थ, मन अप्रसन्न, और आत्मा अवसाद ग्रस्त है। दृश्यमान जगत में शिक्षा और संस्कार ही संयम को बढावा दे सकते है। संयम केवल घर, ग्रहस्थी छोडकर सन्यास धारण कर लेने का नाम नहीं हैं। हर जीवन में संयम की अपेक्षा रहती है। संयम की उपेक्षा अपने अस्तित्व की उपेक्षा है। इस उपेक्षा से जीवन तंत्र खतरनाक मोड पर आ जाता है। स्वास्थ्य की उपेक्षा जीवन की उपेक्षा है। जीवन की उपेक्षा करने वाला जीवन यात्रा में सफल नहीं हो पाता हैं।

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हम प्रकृति के साथ चले

आचार्यश्री ने कहा कि दैनिक जीवन व्यवहार में सत्य, अहिंसा, संयम, सदाचार को भुला देने से बढकर वर्तमान की उपेक्षा क्या होगी। कोई आदमी कितना ही बडा क्यों ना हो जाए, वह अगर इनकी उपेक्षा करता है, तो वह प्रकृति के विरूद्ध जाता है। प्रकृति के विरूद्ध जाने वाला व्यक्ति स्वस्थ और प्रसन्न नहीं रह सकता। उपेक्षित व्यक्ति कितना ही सक्षम और प्रतिभा सम्पन्न हो, उसमें आत्म-संयम और आत्म विश्वास की कमी हो ही जाती है। इसके चलते वह किसी भी क्षेत्र में सफल नहीं हो पाता है। इससे बचाव का एक ही मार्ग है कि हम प्रकृति के साथ चले। उससे हमारा स्वास्थ्य स्वस्थ एवं उत्तम रहेगा और कोरोना जैसी कोई महामारी हमारे साथ खिलवाड नहीं कर पाएगी।

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