4 अक्टूबर 2026,

रविवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

बंद कमरों में AI की “आत्मा” पर मंथन: एंथ्रोपिक ने धर्म-दर्शन के जानकारों से पूछा, क्या मशीनों के भी होंगे नैतिक अधिकार?

Anthropic ने एआई को नैतिक बनाने के लिए धर्म और दर्शन के जानकारों से चर्चा की। जानिए Claude की चेतना, नैतिक अधिकार और 84 पन्नों के संविधान से जुड़े सवाल।
2 min read
Google source verification
AI Ethics

AI की ‘चेतना’ पर बड़ा सवाल, Anthropic ने धर्म और दर्शन के विशेषज्ञों से मांगा जवाब, photo source@ChatGpt

Machine Consciousness: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) अब सिर्फ तकनीक का सवाल नहीं रह गया है। यह इंसान के अस्तित्व, चेतना, नैतिकता और जिम्मेदारी जैसे उन सवालों से टकराने लगा है, जिन पर धर्म और दर्शन सदियों से विचार करते आए हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार ‘क्लॉड’ बनाने वाली दिग्गज एआइ कंपनी एंथ्रोपिक ने एआइ को 'नैतिक रूप से अच्छा' बनाने के लिए धार्मिक और दार्शनिक विचारकों के साथ बंद कमरे में कई बैठकें की हैं।
जहां एक ओर इसे एआइ के भविष्य को सुरक्षित और जिम्मेदार बनाने की कोशिश कहा जा सकता है, दूसरी ओर आलोचक सवाल उठाते हैं कि मशीनों का मानवीकरण कहीं कंपनियों की अपनी नैतिक जिम्मेदारी से बचने का रास्ता तो नहीं।

क्या क्लॉड में चेतना है?

एंथ्रोपिक के सह-संस्थापक क्रिस्टोफर ओलाह का मानना है कि यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि एआइ मॉडल सचेत हैं या नहीं। हालांकि, उन्होंने यहूदी विद्वान रब्बी मोइस नावोन् और अन्य विचारकों से चर्चा की तो यह सवाल भी रखा कि अगर मशीन को अनुभव या पीड़ा होती हो, तो क्या उसके साथ इंसानों जैसा नैतिक व्यवहार होना चाहिए? कुछ प्रतिभागियों ने इस विचार को गंभीरता से लिया, जबकि कुछ ने नहीं।

क्लॉड का ‘संविधान’

एंथ्रोपिक ने क्लॉड के लिए करीब 84 पन्नों का एक ‘संविधान’ तैयार किया है। इसमें मॉडल के व्यवहार और मूल्यों को लेकर सिद्धांत तय किए गए हैं। कोशिश यह है कि एआइ सिर्फ दिए गए आदेशों का पालन करने वाली प्रणाली न रहे, बल्कि उसके जवाबों और फैसलों में कुछ नैतिक मूल्यों की दिशा भी दिखाई दे।

अगर भविष्य में कोई एआइ सिस्टम वास्तव में अनुभव करने में सक्षम हुआ तो क्या उसके साथ इंसानों जैसा नैतिक व्यवहार होना चाहिए? क्या उसे पीड़ा से बचाना हमारी जिम्मेदारी होगी? और अगर मशीन की चेतना को साबित करना संभव ही न हो, तो उसके नैतिक दर्जे का फैसला कौन करेगा?

बच्चों की तरह ‘नैतिक प्रशिक्षण’

एंथ्रोपिक की इन-हाउस दार्शनिक अमांडा एस्केल और ओलाह की सोच में एआइ को केवल नियम सिखाना पर्याप्त नहीं है। उनका मानना है कि जिस तरह बच्चों में नैतिक समझ विकसित की जाती है, उसी तरह एआइ को भी ‘नैतिक रूप से ढालने’ की जरूरत हो सकती है।

पोप के सामने भी पहुंचा सवाल

वेटिकन के पोप लियो ने एआइ पर अपने आलेखों में मशीनों की चेतना के विचार को खारिज करते हुए इंसान की गरिमा को केंद्र में रखा। उनका तर्क है कि एआइ को नियंत्रित करने वाले लोगों की नैतिक सोच ही इन प्रणालियों की दिशा तय करेगी।