
चेन्नई. जलवायु परिवर्तन से समुद्री तटों पर बढ़ते खतरे के बीच आइआइटी मद्रास ने एक ऐसा इंटीग्रेटेड फ्रेमवर्क विकसित किया है जो भारत के तटीय इन्फ्रास्ट्रक्चर, पर्यावरण और वहां रहने वाली आबादी को भविष्य के जलवायु संकटों से सुरक्षित बनाने में मदद करेगा। यह फ्रेमवर्क केवल खतरे का आकलन नहीं करता, बल्कि उनसे निपटने के लिए वैज्ञानिक और व्यावहारिक समाधान भी सुझाता है।
आइआइटी मद्रास के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस ऑन क्लाइमेट चेंज इम्पैक्ट्स ऑन कोस्टल इंफ्रास्ट्रक्चर एंड अडैप्टेशन स्ट्रैटेजी ने विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के सहयोग से यह प्रणाली विकसित की है। इसमें जलवायु विज्ञान, तटीय इंजीनियरिंग, जल संसाधन और पर्यावरणीय अध्ययन को एक साथ जोड़कर तटीय क्षेत्रों के लिए व्यापक सुरक्षा मॉडल तैयार किया गया है।
इस फ्रेमवर्क की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह चक्रवात, तूफानी लहरों, समुद्री बाढ़, तटीय कटाव, समुद्र स्तर में वृद्धि और अत्यधिक वर्षा जैसे खतरों का एकीकृत विश्लेषण करता है। इसके तहत एडवांस्ड क्लाइमेट, साइक्लोन, स्टॉर्म-सर्ज, वेव और हाइड्रोडायनामिक मॉडल विकसित किए गए हैं। शोधकर्ताओं ने एक नई विंड-मर्जिंग तकनीक भी बनाई है जिससे तूफानी लहरों का अधिक सटीक पूर्वानुमान संभव होगा।
कोस्टल वल्नरेबिलिटी इंडेक्स (सीवीआइ) मैप
फ्रेमवर्क के तहत चेन्नई, एन्नोर और कारैकाल के लिए कोस्टल वल्नरेबिलिटी इंडेक्स (सीवीआइ) मैप तैयार किए गए हैं। साथ ही चेन्नई के लिए फ्लड इनडेशन मॉडलिंग और मैपिंग विकसित की गई है, जिससे पहले से जोखिम वाले इलाकों की पहचान कर आपदा प्रबंधन और शहरी नियोजन को बेहतर बनाया जा सकेगा।
इसका सबसे बड़ा फायदा बंदरगाहों, मत्स्य बंदरगाहों, बिजली संयंत्रों, परिवहन नेटवर्क और तटीय शहरों की सुरक्षा के रूप में सामने आएगा। फ्रेमवर्क यह बताएगा कि कौन से क्षेत्र सबसे अधिक जोखिम में हैं और वहां किस प्रकार के सुरक्षा उपाय अपनाने चाहिए। इसके अलावा भूजल में खारे पानी की घुसपैठ रोकने, जलाशय प्रबंधन में सुधार और जलवायु अनुकूल अपशिष्ट जल उपचार प्रणालियों के विकास में भी यह सहायक होगा।
आइआइटी मद्रास के शोधकर्ताओं का मानना है कि यह फ्रेमवर्क साक्ष्य आधारित नीति निर्माण, आपदा तैयारी और तटीय क्षेत्रों के सतत विकास के लिए एक महत्वपूर्ण आधार बनेगा। इससे भविष्य में जलवायु जोखिम कम करने और करोड़ों लोगों की आजीविका तथा महत्वपूर्ण राष्ट्रीय परिसंपत्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी।
तटीय क्षेत्रों के खतरे कम होंगे
‘‘भारतीय समुद्र तट देश के कुछ सबसे महत्वपूर्ण इन्फ्रास्ट्रक्चर और लाखों लोगों की आजीविकाओं के आधार हैं। लेकिन जलवायु परिवर्तन के चलते तटीय खतरों की तीव्रता और बारंबारता बढ़ रही है। इसलिए तटीय क्षेत्रों को सुदृढ़ बनाना अविलंब अनिवार्य है। हमारे केंद्र ने सिस्टम-स्तर पर समाधान का रास्ता चुना है। यह जलवायु मॉडलिंग, इंजीनियरिंग समाधान और सामुदायिक अनुकूलन के एकीकरण से कार्यरूप देने योग्य रणनीतियां बना रहा है। इनसे तटीय क्षेत्रों के खतरे कम होंगे और बचने की तैयारियां बेहतर होंगी।’’
केंद्र के प्रधान अन्वेषक और संस्थान के महासागर इंजीनियरिंग विभाग के फैकल्टी प्रो. एस. ए. सन्नासिराज
Updated on:
16 Sept 2026 04:17 pm
Published on:
16 Sept 2026 04:17 pm
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