
माधवराव सिंधिया के साथ ज्योतिरादित्य सिंधिया। (फोटो- Facebook/RoyalFables)
मध्य प्रदेश के सिंधिया खानदान ने राजनीति की शरण 'राज' बचाने के मकसद से ली थी। न चाहते हुए भी विजया राजे सिंधिया को कांग्रेस की ओर से चुनाव लड़ना पड़ा था। यहीं से सिंधिया खानदान का राजनीति में प्रवेश हुआ था। राजमाता विजया राजे सिंधिया राजनीति में आईं तो बिना इच्छा के थीं, लेकिन आने के बाद रमती ही चली गईं। वह खुद भी लगातार जीतती रहीं और अगली पीढ़ी वालों को भी राजनीति में स्थापित करती चली गईं। हालांकि अगली पीढ़ी के नेताओं को कई उतार-चढ़ाव भी देखने पड़े। इसी कड़ी में एक बार माधव राव सिंधिया भी बड़ी मुसीबत में फंस गए थे।
माधव राव ने नौ चुनाव लड़े और जीते थे, लेकिन 1998 का चुनाव उन्हें बड़ा भारी पड़ गया था। वह किसी तरह 23000 वोट से जीते थे। इससे पहले के चुनावों में उनकी जीत का अंतर लाखों में होता था। फिर 1998 में क्या हो गया था? उस चुनाव में जाटों ने बगावत कर दी थी। तब माधव राव ने कांग्रेस के अपने मित्र कुंवर नटवर सिंह से मदद की गुहार लगाई थी।
सिंह ने 2001 में विमान हादसे में माधव राव की मौत के बाद उन्हें याद करते हुए 'फ्रंटलाइन' पत्रिका में एक लेख लिखा था। इसमें उन्होंने 1998 के चुनाव की बात याद की थी। उन्होंने लिखा था- मतदान से तीन दिन पहले सिंधिया ने मुझे फोन किया और कहा कि एक मराठा को जाट से मदद की दरकार है। क्या आप कुछ दिन के लिए ग्वालियर आ सकते हैं?
नटवर सिंह ग्वालियर गए और जाटों को मनाया। जाट नेताओं का कहना था कि सिंधिया ने जाट समुदाय की अनदेखी की। सिंह ने उन्हें मनाया और समझाया कि यह मुद्दा उठाने का सही वक्त नहीं है। वह भी एक ऐसे व्यक्ति के खिलाफ जिसने 1971 से उन लोगों और ग्वालियर के लिए इतना कुछ किया हो। उन्होंने भरतपुर के नाम पर जाटों की संवेदना को भुनाया। भरतपुर जाटों के लिए वैसा ही है, जैसे राजपूतों के लिए उदयपुर।
भरतपुर में नटवर सिंह की अच्छी पैठ थी। वह खुद वहां से चुनाव लड़ रहे थे (और 68000 वोट से जीते थे)। ऐसे में उनका 'भरतपुर कार्ड' चल गया और जाट सिंधिया को वोट देने के लिए मान गए। इस तरह सिंधिया की जीत हुई। विमान हादसे में मौत के चलते यह उनका आखिरी चुनाव साबित हुआ। इसके बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया की राजनीति में एंट्री हुई थी।
ज्योतिरादित्य को पिता से राजनीति के गुर सीखने का मौका तो नहीं मिला, लेकिन उनसे उन्हें ज़िंदगी के कई सबक मिले थे। इन्हीं में से एक सबक था निडर रहने का। ज्योतिरादित्य ने इस संबंध में पिता से जुड़ी एक याद साझा की है। नमिता भंडारे और वीर संघवी की लिखी किताब 'माधव राव सिंधिया: ए लाइफ' में ज्योतिरादित्य के हवाले से विस्तार से यह प्रसंग बताया गया है।
शिवपुरी के नेशनल पार्क में पिता-पुत्र शिकार पर गए थे। जीप माधव राव चला रहे थे। शाम हो रही थी। अंधेरा छाने लगा था। पिता ने मज़ाक किया कि जीप खराब हो गई। बेटे ज्योतिरादित्य को डर लगने लगा कि कहीं रात में शेर उनका शिकार न कर ले। वह रोने लगे। बेटे का रोना देख कर पिता को गुस्सा आ गया। उन्होंने ज्योतिरादित्य को जीप से नीचे उतरने के लिए कहा और जीप की हेडलाइट की रोशनी में जंगल में अकेले आगे बढ़ने के लिए कहा। कुछ मिनट बाद माधव राव ने बेटे का हाथ पकड़ कर उसे जीप में धकेल दिया और बोले, 'मैं अपने बेटे को रोंदू बच्चा नहीं देखना चाहता।'
बेटे से जुड़ा एक किस्सा माधव राव सिंधिया के बारे में भी इसी किताब में दर्ज है। यह माधव राव और उनकी मां विजया राजे सिंधिया के बारे में है। विजया राजे संभाजी राव आंग्रे से बेहद प्रभावित थीं। इस बात को लेकर एक दिन जय विलास महल में मां-बेटे में कहासुनी भी हो गई। लेकिन, राजमाता पर आंग्रे का असर कम नहीं हुआ। तब माधव राव ने आखिरी चाल चली। उन्होंने कहा, 'अम्मा! ऐसे नहीं चलेगा। आपको मुझे और आंग्रे में से किसी एक को चुनना होगा।' राजमाता ने बड़े आराम से जवाब दिया, 'मैं आंग्रे को नहीं छोड़ सकती। उन्होंने बुरे वक्त में मेरा बहुत साथ दिया है।'
माधव राव को बड़ी हैरानी हुई। उन्होंने एक और कोशिश करते हुए कहा, 'आंग्रे के लिए आप अपने इकलौते बेटे को छोड़ देंगे! मां पर इसका कोई असर नहीं हुआ। वह कंधा उचकाते हुए कमरे से बाहर चली गईं।
मां-बेटे के रिश्ते में एक समय ऐसा भी आया था जब माधव राव सिंधिया ने विजया राजे सिंधिया से साफ कह दिया था कि अब मैं अपने फैसले खुद ले सकता हूं।
Updated on:
26 Oct 2026, 6:55 PM IST
Published on:
26 Oct 2026, 6:20 PM IST
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