
विजया राजे के साथ शादी की रस्में निभाते जीवाजी राव सिंधिया (दाएं) और शादी के बाद सिंधिया दंपती। (फोटो सोर्स: 'द लास्ट महारानी ऑफ ग्वालियर: एन ऑटोबायोग्राफी)
लेखा रानी (विजया राजे सिंधिया) उन दिनों लखनऊ कॉलेज में पढ़ रही थीं। कॉलेज में पहला टर्म भी पूरा नहीं हुआ था कि उनके पिता ने उनके सामने शादी का प्रस्ताव रख दिया था। इससे पहले एक लड़के ने खुद लेखा रानी को शादी का प्रस्ताव दिया था, जिस पर उन्होंने कोई प्रतिकृया नहीं दी थी। उस समय की परंपरा और पारिवारिक रीति-रिवाज को मानते हुए उनका मानना यही था कि शादी घरवाले ही तय करेंगे। अब पिता की ओर से जिस लड़के से शादी का प्रस्ताव आया था, उसका नाम था लेफ्टिनेंट चौहान। वह जागीरदार परिवार से था और ब्रिटिश राज में भारतीय सेना का अफसर था। उसकी तैनाती सागर (मध्य प्रदेश) में थी। सागर ही वह जगह थी, जहां लेखा रानी के दादा नेपाल से आकर बसे थे।
अपनी शादी के किस्से बयां करते हुए विजया राजे ने अपनी जीवनी ('द लास्ट महारानी ऑफ ग्वालियर: एन ऑटोबायोग्राफी') में बताया है कि उनके चाचा हेम लेफ्टिनेंट चौहान को देखने सागर गए। चाचा को पसंद आया। दादी ने भी हां कर दी थी। अब कुंडली मिलाने की बारी आई। वो भी मिल गई। इसके बाद एक-दूसरे की तस्वीर एक-दूसरे के घर वालों को दी जानी थी। लड़के की वर्दी में रौबदार फोटो आई। साथ में एक खत भी आया। खत हेम चाचा की बेटी ने लिखा था। इसमें उन्होंने लड़के की तारीफ की थी और बताया था कि वह शराब को हाथ तक नहीं लगाता। खैर, दोनों तरफ से रजामंदी हुई और अगले साल (1940) 8 मई शादी की तारीख तय हो गई।
लेकिन, इस बीच एक अनहोनी आकार लेने लग गई थी। नई जंग शुरू हो गई थी। इसे देखते हुए विजया राजे, उनकी दादी, हेम चाचा, उनकी पत्नी और बेटी खेम को कलकत्ता रवाना कर दिया गया। अगले तीन महीने वे कलकत्ता में ही रहे। मार्च की शुरुआत में सागर वापसी की पांच दिन लंबी यात्रा शुरू हुई। पहली रात पटना में पड़ाव डाला गया। वहीं खेम को पेट में भयंकर दर्द हुआ। अस्पताल जाने पर अपेंडिक्स होने की जानकारी हुई। तुरंत सर्जरी करनी पड़ी। 8 मई (शादी की तारीख) को भी वह पटना के अस्पताल में ही थीं।
खेम को जब डॉक्टरों ने खतरे से बाहर बताया और जब तक सभी आगे की यात्रा जारी रखने की स्थिति में आए तब तक आधा जून निकल चुका था। इस बीच लेफ्टिनेंट चौहान के बटालियन को भी विदेश जाकर ड्यूटी जॉइन करने का आदेश मिल चुका था। उन्होंने विजया राजे के पिता को चिट्ठी लिख कर कहा कि सगाई को खत्म माना जाए क्योंकि वह नहीं चाहते कि शादी होते ही लड़की पर विधवा होने का खतरा मंडराने लगे। उन्हें लग रहा था कि लड़ाई सालों चलेगी, इसलिए उन्होंने युद्ध के बाद शादी करने का प्रस्ताव भी नहीं रखा।
अब विजया राजे के छोटे मामा शमशेर ने उनकी शादी करवाने का बीड़ा अपने हाथ में ले लिया था। वह छुट्टियां मनाने के लिए अपनी पत्नी के साथ कलकत्ता जा रहे थे। उन्होंने विजया राजे को भी साथ ले लिया। ट्रेन में ही शमशेर ने विजया राजे को बताया कि वह त्रिपुरा के राजकुमार दुर्जय किशोर देव वर्मा से उनकी शादी करवाना चाहते हैं। दुर्जय त्रिपुरा के महाराजा के छोटे भाई थे।
विजया राजे और दुर्जय की बीच मुलाक़ात का इंतजाम किया गया। कलकत्ता के 'फिरपो' में इस मुलाक़ात का प्रबंध हुआ। मुलाक़ात में बात बन गई। विजया राजे ने अपने लिए जैसा वर सोच रखा था, उससे अलग होते हुए भी दुर्जय से शादी के लिए उन्होंने मना नहीं किया। लेकिन, कई सप्ताह बीत जाने के बाद उन्हें ऐसा लगा कि शादी से जुड़ी आगे की बातचीत या तैयारी धीमी पड़ चुकी है। धीरे-धीरे विजया राजे को पता चल गया कि उनकी दादी और मामा अब इस शादी को लेकर उत्साहित नहीं थे। उन्हें जोड़ी बेमेल लग रही थी।
इसी बीच विजया राजे को लेकर एक और यात्रा का कार्यक्रम बना लिया गया। कहा गया कि हरदोई जा रहे हैं, लेकिन विजया राजे को लग गया था कि कार्यक्रम कुछ और ही है। हरदोई बोल कर उन्हें मुंबई ले जाया गया। वहां ग्वालियर के महाराजा सरदार महादिक से बात-मुलाक़ात हुई। एक मुलाक़ात हुई तो महाराजा ने दूसरी और फिर तीसरी मुलाक़ात की पेशकश की। कभी खाने पर बुलाया तो कभी घुड़सवारी देखने के लिए। तीसरी मुलाक़ात खत्म होने के कुछ ही देर बाद महाराजा का फोन आ गया। वह चाहते थे कि बंबई से रवाना होने से पहले शादी की तारीख तय हो जाए तो अच्छा हो। उन्होंने इच्छा जताई कि शादी फरवरी से आगे नहीं बढ़े।
21 फरवरी, 1941 की रात 10.31 बजे का शादी का मुहूर्त निकला और लेखा रानी महाराज जीवाजी राव सिंधिया की महारानी बन गईं। शादी के बाद उन्हें विजया राजे सिंधिया नाम दिया गया। महाराजा नई रानी को हनीमून के लिए बंबई ले गए। विजय राजे ने जीवनी में लिखा है कि ट्रेन उनके महल के पोर्च तक आ गई थी। मखमली पर्दे, सोफा, डाइनिंग रूम, आलीशान बिस्तर वाले तीन बेडरूम…ये सारी सुविधा ट्रेन के भीतर ही थी। ऐसा लगा जैसे वे महल में ही हों। नौकर-चाकर भी महल के ही थे। उनके लिए अलग से डिब्बे जुड़े थे। इन डिब्बों को बंबई जाने वाली ट्रेन में जोड़ दिया गया। सुबह महारानी की नींद खुली तो वह बंबई में थीं।
विजया राजे सिंधिया घराने की पहली व्यक्ति थीं, जिन्होंने राजनीति में कदम रखा। उन्होंने राज खोने के डर के चलते किन परिस्थितियों में राजनीति में कदम रखा, वह कहानी यहां पढ़िए।
Updated on:
11 Oct 2026 05:35 pm
Published on:
11 Oct 2026 05:18 pm
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