
World’s rarest diseases|फोटो सोर्स –Freepik
Rare Diseases in the World: दुनियाभर में कई ऐसी बीमारियां मौजूद हैं, जिनके बारे में लोग बहुत कम जानते हैं। इन दुर्लभ रोगों के लक्षण अक्सर सामान्य समस्याओं जैसे दिखते हैं, लेकिन उनके पीछे वजह बेहद अनोखी और जटिल होती है। पानी से एलर्जी जैसी अजीब स्थिति से लेकर ऐसी बीमारियां, जिनमें शरीर अपनी ही कोशिकाओं पर हमला करने लगता है इनका इलाज मुश्किल होता है और कई मामलों में डॉक्टरों के लिए भी इनकी पहचान चुनौती बन जाती है। ऐसे में इन रेयर डिज़ीज़ के बारे में जागरूक रहना बेहद जरूरी है, ताकि समय रहते सही पहचान और इलाज संभव हो सके।
यह बीमारी दुनिया की सबसे दुर्लभ बीमारी मानी जाती है। राइबोज-5-फॉस्फेट आइसोमेरेज (RPI) नामक एंजाइम की कमी से यह समस्या होती है। इससे मांसपेशियों में अकड़न, दौरे और दिमाग के वाइट मैटर में कमी जैसी दिक्कतें पैदा होती हैं। आश्चर्य की बात यह है कि 1984 में मिले एकमात्र मरीज के बाद आज तक इसका कोई दूसरा मामला सामने नहीं आया।
इस बीमारी में बच्चे कम उम्र में ही बूढ़े दिखने लगते हैं। उनकी त्वचा झुर्रीदार हो जाती है, बाल झड़ने लगते हैं और आंखें उभरी हुई दिखाई देती हैं। प्रोजेरिया बेहद दुर्लभ है करीब 2 करोड़ लोगों में से सिर्फ 1 को यह होता है। अभी तक इसका कोई स्थायी इलाज मौजूद नहीं है।
दुनिया में इसके केवल दो ही मामले दर्ज हैं वह भी जुड़वां बहनों के। यह एक न्यूरोमस्कुलर डिसऑर्डर है, जिसमें धीरे-धीरे शरीर की मांसपेशियां कमजोर होती जाती हैं। डॉक्टर लगातार इस बीमारी पर शोध कर रहे हैं, क्योंकि उम्मीद है कि भविष्य में इसके और मामले सामने आ सकते हैं।
इस बीमारी में खून में मेटहिमोग्लोबिन नामक तत्व बढ़ जाता है, जिससे खून का रंग नीला होने लगता है। इसी कारण मरीज की त्वचा, होंठ और नाखून भी नीले दिखाई देते हैं। यह स्थिति देखने में डरावनी लग सकती है लेकिन इसके पीछे एक विशिष्ट रक्त विकार होता है।
पानी से एलर्जी सुनकर आपको यकीन न हो, लेकिन यह बीमारी वास्तविक है। पानी के संपर्क में आने पर त्वचा लाल पड़ जाती है और खुजली होने लगती है। कुछ लोगों में यह प्रतिक्रिया पसीने, बारिश या बर्फ के संपर्क में आने पर भी हो सकती है। यह दुनिया की सबसे दुर्लभ एलर्जिक स्थितियों में से एक है।
इस बीमारी में व्यक्ति अचानक अपनी मातृभाषा का लहजा बदलकर किसी दूसरे देश या क्षेत्र जैसा बोलने लगता है। यह आमतौर पर दिमाग में चोट लगने के बाद होता है, जिससे जुबान और बोलने की प्रक्रिया प्रभावित होती है।
यह एक गंभीर और दुर्लभ न्यूरोलॉजिकल बीमारी है, जिसमें शरीर में यूरिक एसिड अत्यधिक मात्रा में बनने लगता है। प्रभावित व्यक्ति खुद को चोट पहुंचाने जैसे व्यवहार दिखा सकता है जैसे सिर पटकना या हाथ काट लेना। यह बीमारी हर 3 लाख में सिर्फ एक बच्चे को होती है और लगभग सभी मामले लड़कों में पाए जाते हैं।
यह बीमारी दुनिया के एक ही समुदाय पापुआ न्यू गिनी की ‘कुरु’ जनजाति तक सीमित है। यहां एक पुराने रिवाज के कारण लोग अपने दिवंगत परिजनों के अंग खाते थे, और इसी के जरिए ‘प्रायन’ नामक संक्रामक प्रोटीन शरीर में पहुँच जाता था। यह बीमारी तंत्रिका तंत्र को बुरी तरह प्रभावित करती है।
इस बीमारी में नवजात शिशु की त्वचा मोटी, सख्त और मछली की स्केल जैसी दिखने लगती है। त्वचा फटने और संक्रमण का खतरा लगातार बना रहता है, साथ ही शरीर तापमान नियंत्रित भी नहीं कर पाता। आधुनिक चिकित्सा से अब मरीजों की उम्र बढ़ने लगी है, लेकिन पूर्ण इलाज अब भी नहीं है।
इस बीमारी में शरीर की मांसपेशियां धीरे-धीरे हड्डियों का रूप ले लेती हैं। यानी जहां मांसपेशियां होनी चाहिए, वहां अतिरिक्त हड्डियां बनने लगती हैं, जिससे शरीर धीरे-धीरे जड़ हो जाता है। दिल, जीभ और आंखों की कुछ मांसपेशियों को छोड़कर लगभग पूरा शरीर प्रभावित हो सकता है।
Updated on:
16 Nov 2025 02:46 pm
Published on:
16 Nov 2025 02:45 pm
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