पंचायती राज व्यवस्था में सरपंच को गांव का मुखिया माना जाता है, लेकिन हकीकत में वह अक्सर व्यवस्था की जटिलताओं में उलझा नजर आता है। कई सरपंचों का कहना है कि वे निर्णय लेने में पूरी तरह स्वतंत्र नहीं हैं। योजनाएं उच्च स्तर पर तय होती हैं, जिससे गांव की वास्तविक जरूरतें पीछे रह जाती हैं।